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Sunday, July 12, 2020

जिये जा रहे थे

अनचाहें रास्तें पर चले जा रहे थे
दुनियाँ की बातों में फसे जा रहे थे
लोगों की तारीफों में बहे जा रहे थे
न जाने कौन से गुरुर में जिये जा रहे थे

सच्चाई से मुँह मोड़ भागे जा रहे थे
इंसानियत की दिवार तोड़ चले जा रहे थे
स्वार्थ की चादर ओढ़ सोये जा रहे थे
न जाने कौन से धर्म को जिये जा रहे थे

प्रकृति ने खेल खेला तो रोये जा रहे थे
अपनेही कर्मों की सजा भुगतें जा रहे थे
घर में बैठ जीवन की आस लगाए जा रहे थे
न जाने कौन से अधर्मों की कृपा जिये जा रहे थे
✍ रानमोती



 ©Rani Amol More

6 comments:

  1. हम तो जिये जा रहे थे, कोरोना आगया और ब्रेक लग गया ।

    ReplyDelete
  2. Very nice ��

    ReplyDelete
  3. Today's condition
    स्वार्थ की चादर ओढ़ सोये जा रहे थे

    ReplyDelete

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