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Friday, July 31, 2026
Friday, January 2, 2026
Mumbai’s teen innovator and author Arjit More wins International Excellence Award 2026
Teen author and innovator Arjit More from Washim has been honoured with
the International Excellence Award 2026 for his research-driven writing in
science and innovation. The award was conferred for his English book, “Jigyasa:
From Curiosity to Clarity”, presented by Exceller publishing during the
Global Author Summit 2026 (Session 1) held on January 2, under the category of
Young Adult Writers (Under 18).
Exceller, an ISO 9001:2015-certified organisation, is a member of the
Federation of Indian Publishers and is affiliated with the International
Publishers Association, Geneva. The publisher has worked with authors from over
20 countries, aiming to amplify socially relevant and thought-provoking
writing.
The book explores science beyond textbooks, positioning it as a tool for
societal engagement. It emphasises curiosity, observation-led research,
learning through experimentation, and navigating failure as part of the
scientific process. Written in an accessible style, the book seeks to cultivate
scientific temper, creativity and innovation among students.
Sunday, April 20, 2025
ज्वालामुखी और नदी
ज्वालामुखी का यह भयावह नज़ारा देख कर, पास में डटा पहाड़ बोल पडा,
"कब तक पानी से दूर रहोगे? बुझालो अपने आपको ! जितना जलोगे, लपटे उतनीही गहरी होकर अंगारे बरसाएगी। मान लो मेरी बात, जिद छोड़ दो। देखो मेरी तरफ, मैंने कैसे इस समंदर के पानी में अपने आपको झोंक दिया है। कितनी ठंडक है इस पानी में। काला पत्थर बनकर शान से पडा हूँ। तुम भी अनुकरण करो। बन जाओ मेरे जैसे।"
यह सुनकर अपनी जलती लपटों को संवारकर, ज्वालामुखी हसकर बोलने लगा।
"देखो, मुझे पानी से नफरत नहीं है, पर इस समंदर के खारे पानी से, मैं बुझना नहीं चाहता। मैं तो उस मीठी धारा के इंतजार में हूँ, जो उत्तर की ओर से इस समंदर में समाने आने वाली है। मैंने उस नदी को, और उसकी मीठी धारा को, कभी देखा नहीं है। पर उसकी आने की आशा से ही ठंडक की अनुभूति पा लेता हूँ। मुझे पता है, की वह नदी ज़रूर आएगी। जब रात को सब शांत होता है, तो मैं उसके आने की आहट महसूस कर पाता हूँ। उसकी बहती धाराओं की आवाज सुन पता हूँ। उसकी आवाज में खडखडाहट छुपी है, पर वह मुझे, इस मुश्किल समय में, कोयल के गीतों समान भांती है। वह समंदर के पानी जैसी एकही जगहपर उछलती नहीं । बल्कि, अनगिनत पत्थरों, कंकड़ों को काटकर, बड़े दूर से बहती आ रही है। रास्ते में उसके किनारे कई नगर बसे हुए है। उन सबकी प्यास बुझाकर, खेत खलियानो को नहलाकर समंदर के आग़ोश में समाने आ रही है।"
यह सब सुनते ही, पहाड बोल पडा।
"देखों दोस्त, में तुम्हारे स्वप्न को तोडना तो नहीं चाहता। पर मैंने सुना है, उसका रास्ता इतना लम्बा है की वह धूप की वजह से कईबार बिच में ही सुख जाती है।
तब ज्वालामुखी बोला।
“मुझे उसका इंतजार रहेगा ! अगर नहीं आई, तो उसके मधुर सुरों से खुदको समझा लूंगा”.
यह सुनकर पहाड फिर बोला। “मैंने तो यह भी सुना है की, वह आते आते मैली हो जाती है। क्या तब भी, तुम उसे पसंद करोगे ?" "हाँ, क्यों नहीं ! उसका मैलापन तो बाहरी है। आज भी वह पवित्र गंगा बनकर पूजनीय है।" नदी बोली।
सदियों बाद, जब नदी समंदर से मिलने आने लगी, तो उसने जाना की ज्वालामुखी उससे क्या ख्वाहिश लगा बैठा है।
उसी वक्त आकाश में सूर्य की तपती किरणों ने पूछा, "हे नदी, बताओ तुम कहां जाना चाहती हो? समंदर में विलीन होकर विशाल बनना चाहती हो, या फिर मेरे गर्मी से भाप बनकर इस खुले गगन में उडना चाहती हो।" नदी ने कहा, “हे सूर्य, मुझे आप भाप बनाकर उडा लो और एक बडासा बादल बनाकर समंदर के किनारे ज्वालामुखीपर बरसा दो। ताकि, उसकी गुजारिश पूरी हो सके।
सूर्य ने कहा, क्योँ तुम विशाल समंदर में नहीं जाना चाहती ? तो नदी ने कहा समंदर को मेरी जरुरत नहीं है, वह खुद ही इतना विशाल है, की मेरे होने ना होने से उसे कोई फर्क नहीं पड़ेगा। पर यह ज्वालामुखी अगर नहीं बुझा, तो सदियोंतक ऐसा ही जलता रहेगा, क्योंकि उसे बस मेरे मीठे पानी का इंतजार है।"
Friday, April 18, 2025
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