Teen author and innovator Arjit More from Washim has been honoured with
the International Excellence Award 2026 for his research-driven writing in
science and innovation. The award was conferred for his English book, “Jigyasa:
From Curiosity to Clarity”, presented by Exceller publishing during the
Global Author Summit 2026 (Session 1) held on January 2, under the category of
Young Adult Writers (Under 18).
Exceller, an ISO 9001:2015-certified organisation, is a member of the
Federation of Indian Publishers and is affiliated with the International
Publishers Association, Geneva. The publisher has worked with authors from over
20 countries, aiming to amplify socially relevant and thought-provoking
writing.
The book explores science beyond textbooks, positioning it as a tool for
societal engagement. It emphasises curiosity, observation-led research,
learning through experimentation, and navigating failure as part of the
scientific process. Written in an accessible style, the book seeks to cultivate
scientific temper, creativity and innovation among students.
Speaking after receiving the award More, thanked mentors, teachers and
readers who supported the book’s journey. He also said he intends to continue
research-based, socially impactful scientific writing in the years ahead.
सदियों से समंदर के किनारे, एक ज्वालामुखी गर्म होकर अपनी चरमपर, ज्वालायें बरसा रहा था। जब तूफान आता, तो समंदर ज्वालाओ को ठंडा करने के लिए, अपना पानी उछाल उछाल कर उसपर ले जाता। हवा के झोंकों ने भी, कई बार उन लहरों को उठाकर जलती लपटों को बुझाना चाहा, परंतु ज्वालायें मानो जिद्दी होकर, खुदको पानी से दूर करती रही। जैसे उन्हें नफरत हो समंदर के पानी से। उन्हें खुदको जलाना मंजूर था, पर खारे पानी से बुझना नहीं। ज्वालामुखी का यह भयावह नज़ारा देख कर, पास में डटा पहाड़ बोल पडा, "कब तक पानी से दूर रहोगे? बुझालो अपने आपको ! जितना जलोगे, लपटे उतनीही गहरी होकर अंगारे बरसाएगी। मान लो मेरी बात, जिद छोड़ दो। देखो मेरी तरफ, मैंने कैसे इस समंदर के पानी में अपने आपको झोंक दिया है। कितनी ठंडक है इस पानी में। काला पत्थर बनकर शान से पडा हूँ। तुम भी अनुकरण करो। बन जाओ मेरे जैसे।" यह सुनकर अपनी जलती लपटों को संवारकर, ज्वालामुखी हसकर बोलने लगा।
"देखो, मुझे पानी से नफरत नहीं है, पर इस समंदर के खारे पानी से, मैं बुझना नहीं चाहता। मैं तो उस मीठी धारा के इंतजार में हूँ, जो उत्तर की ओर से इस समंदर में समाने आने वाली है। मैंने उस नदी को, और उसकी मीठी धारा को, कभी देखा नहीं है। पर उसकी आने की आशा से ही ठंडक की अनुभूति पा लेता हूँ। मुझे पता है, की वह नदी ज़रूर आएगी। जब रात को सब शांत होता है, तो मैं उसके आने की आहट महसूस कर पाता हूँ। उसकी बहती धाराओं की आवाज सुन पता हूँ। उसकी आवाज में खडखडाहट छुपी है, पर वह मुझे, इस मुश्किल समय में, कोयल के गीतों समान भांती है। वह समंदर के पानी जैसी एकही जगहपर उछलती नहीं । बल्कि, अनगिनत पत्थरों, कंकड़ों को काटकर, बड़े दूर से बहती आ रही है। रास्ते में उसके किनारे कई नगर बसे हुए है। उन सबकी प्यास बुझाकर, खेत खलियानो को नहलाकर समंदर के आग़ोश में समाने आ रही है।"
यह सब सुनते ही, पहाड बोल पडा। "देखों दोस्त, में तुम्हारे स्वप्न को तोडना तो नहीं चाहता। पर मैंने सुना है, उसका रास्ता इतना लम्बा है की वह धूप की वजह से कईबार बिच में ही सुख जाती है।
तब ज्वालामुखी बोला। “मुझे उसका इंतजार रहेगा ! अगर नहीं आई, तो उसके मधुर सुरों से खुदको समझा लूंगा”. यह सुनकर पहाड फिर बोला। “मैंने तो यह भी सुना है की, वह आते आते मैली हो जाती है। क्या तब भी, तुम उसे पसंद करोगे ?" "हाँ, क्यों नहीं ! उसका मैलापन तो बाहरी है। आज भी वह पवित्र गंगा बनकर पूजनीय है।" नदी बोली।
सदियों बाद, जब नदी समंदर से मिलने आने लगी, तो उसने जाना की ज्वालामुखी उससे क्या ख्वाहिश लगा बैठा है। उसी वक्त आकाश में सूर्य की तपती किरणों ने पूछा, "हे नदी, बताओ तुम कहां जाना चाहती हो? समंदर में विलीन होकर विशाल बनना चाहती हो, या फिर मेरे गर्मी से भाप बनकर इस खुले गगन में उडना चाहती हो।" नदी ने कहा, “हे सूर्य, मुझे आप भाप बनाकर उडा लो और एक बडासा बादल बनाकर समंदर के किनारे ज्वालामुखीपर बरसा दो। ताकि, उसकी गुजारिश पूरी हो सके।
सूर्य ने कहा, क्योँ तुम विशाल समंदर में नहीं जाना चाहती ? तो नदी ने कहा समंदर को मेरी जरुरत नहीं है, वह खुद ही इतना विशाल है, की मेरे होने ना होने से उसे कोई फर्क नहीं पड़ेगा। पर यह ज्वालामुखी अगर नहीं बुझा, तो सदियोंतक ऐसा ही जलता रहेगा, क्योंकि उसे बस मेरे मीठे पानी का इंतजार है।"
हे आसमां, तू और मैं, एक जैसे ही तो हैं।
मुझे पसंद है तेरा चाँद, तेरा सूरज, तेरे तारे, तेरा रात का अंधेरा और दिन का उजियाला।
मुझे पसंद है तेरा खुलापन, तू हर वक्त चलता रहता है, फैलता रहता है।
तेरी कोई सीमा नहीं, तू बंधनों में बंधा नहीं है।
तेरी विशालता मेरी आँखों में समाती नहीं, पर तूने मुझे पूरी तरह ढक लिया है।
तू साया भी है, और छाया भी।
जब इस धरा के, दुख देखकर, तेरी आँखें नम होती हैं,
तो वे बादल बनकर, इस प्यासी ज़मीन पर बरसती हैं।
तू मुक्ति है, और मैं बंधन।
एक दिन, यह धरती फट जाएगी, सब कुछ इसमें समा जाएगा।
ये पेड़, ये पौधे, ये इंसान, ये जानवर, सब राख बनकर उड़ जाएँगे।
पर तू… तू हमेशा रहेगा।
मैं, सकल शब्दमय, काली हूँ,
और उसकी हुंकार के रूप में, स्वर ओम, भी हूँ।
यह ब्रह्मांड, और यह स्वर,
दोनों मिलकर, एक हो जाएँगे ।
आपस में घुल जाएँगे, मिल जाएँगे।
हे आसमां, तू और मैं एक जैसे ही तो हैं।
मेरी असीमता, तुझ में जुड़ जाती है।
तेरे और मेरे बीच की दीवारें टूटकर जो रास्ता बनता है,
वो अनदेखा है, पर है।
तेरे संग जुड़ने का, यह अनोखापन, इतना प्यारा है,
की जब कभी मौत डराने आ भी जाए,
तो फिक्र कहाँ!
क्योंकि मुझे पता है —
हे आसमां, तू और मैं एक जैसे ही तो हैं।
रानमोती प्रस्तुत "चार या भिंतीत" हे नवीन मराठी गीत प्रतीक आहे, पती पत्नीच्या सुंदर, सहज, प्रेमळ नात्याचं, आशेचं, दोघांमधील नात्याला प्रेमाच्या बंधनात घट्ट बांधून ठेवणाऱ्या भावनांना शब्दरूपी कण्ठस्वरात मुक्त करणाऱ्या संगीताचं, ऐकणाऱ्याला एक अविस्मरणीय आनंद देऊन चिरकाळ मनामध्ये स्थान निर्माण करणारं.
मैंने अक्सर खामोश रहना पसंद किया, पर पता चला लोग अपनी अपनी राय बनाकर बात करना शुरू कर दे, उससे पहले मेरा बात करना जरूरी है। पेड़ पर सुन्दर सुन्दर फुल खिलेते है । हरे हरे पत्ते भी साथ में अपना रंग जमाते है। लोग उन फूल पत्तों को कमजोर समझकर तोड दे, उससे पहले पेड को अपने काँटों को उगाना भी जरूरी है। मैंने अक्सर साधा जिवन व्यतीत करना पसंद किया, पर लोग छोटा सा हवा का झोका समझकर मेरी मौजुदगी को ही नजरअंदाज कर दे, उससे पहले मुझे आँधी, तुफान बनना जरूरी है। मुझे दिखावे से ना नफरत है, ना प्रेम। हमेशा मैंने अपने तरीकों से चलना पसंद किया। पर लोगों का मेरे प्रति बरताव का तरीका बदल जाये, उससे पहले मुझे भी अपने तौर तरीके आजमाना जरूरी है। जीवन में संभावनाएं, मुझे अपने कर्मो से मिली है। मै चाहू तो ठुकराऊ, मै चाहू तो अपनाऊ। पर लोग मेरी संभावनाओ को ही ठुकराये, उससे पहले, मुझे खुद एक स्वयंरचित संभावना बनना जरूरी है।
एक समय की बात है। एक चिड़िया एक बड़े से पेड़ की डाली पर अपना घोंसला बनाने के लिए कुछ तिनके इकट्ठे कर रही थी। उसे देख एक हवा का झोंका लहराते हुए उसके पास आकर पूछने लगा। हे चिड़िया रानी क्या तुम मेरे साथ उड़ना पसंद करोगी ? चिड़िया ने क्षण का विलम्ब न करते हुए जवाब दिया, नहीं नहीं अभी नहीं, मुझे घोंसला बनाना है। तुम फिर कभी आना अभी मुझे फ़ुरसत नहीं।
फिर कुछ दिन बाद, हवा का झोंका आया। देखा की चिड़ियाने अपना सुन्दरसा घोंसला बनाया था। और उसके बच्चे घोसले में सुरक्षित थे। उस झोंके ने पूछा हे चिड़िया रानी, क्या अब तुम मेरे साथ उड़ना पसंद करोगी ? मैं अभी अभी एक सुन्दर हरे भरे खेत से झूल कर आया हूँ। तुम कहो तो, मैं तुम्हें भी वहाँ ले जाऊँगा, जहा तुम्हारे पसंद के दाने उगते है। क्या तुम आओगी ? चिड़िया ने कहा अब कहा फुरसत, बच्चों को खिलाना, पिलाना है। तुम बाद में आना, मै जरूर आउंगी। हवा के झोंके ने कहा, तब तो बहुत देर हो जाएगी। खेत खलियान सुख जाएंगे और तुम्हें हरे भरे दाने भी नहीं मिलेंगे। लेकिन चिड़िया ने ,तुम फिर कभी आना कहकर, उसे टाल दिया।
कुछ दिनों बाद, बच्चे बड़े हुए, पंख फैलाना सिख गए और एक दिन उड़ गए हमेशा हमेशा हमेशा के लिए। एक दिन पेड़ की वह डाली भी काट दी गई, जहाँ चिड़िया का घोंसला था। घोंसला निचे गिरकर बिखर गया। चिडिया पेड़ की दूसरी डाली पर गुमसुम बैठ, हवा के झोंके का इंतज़ार कर रही थी। भरी आँखों से कहने लगी, देखो मैं आज उड़ना चाहती हूँ, क्या तुम आओगे, मुझे उस हरे भरे खेत में ले जाओगे, जहा मेरी पसंद के दाने उगते हैं ? वो देर तक इंतज़ार करती रही, लेकिन हवा का झोंका आया नहीं। चिड़िया सुन्न होकर मन ही मन रोकर कहने लगी, जिस बच्चों के लिए मै उडी नहीं, वो बच्चे अब हमेशा हमेशा के लिए उड़ गए। मैंने जिस घोंसले के लिए अपने अरमान बिखराए, वो घोंसला भी अब बिखर गया। जिस चीज़ को जोड़ने और सँजोने की कोशिश की वह टूट गयी।
चिडिया ये सब सोच ही रही थी, तब एक हवा का झोंका आया। उसे देख चिड़िया ने ख़ुश होकर कहा अब मै तैयार हूँ, क्या मैं तुम्हारे साथ उड़ सकती हूँ। उस हवा के झोंके ने कहा, देखो चिड़िया रानी, तुम्हारे पंख कमज़ोर हो चुके हैं और मैं तेज़ हवा का झोंका हूँ, तुम मेरे बहाव को सह नहीं पाओगी और वैसे भी मैं बहुत दूर जा रहा हूँ, तुम वहाँ तक उड़ नहीं पाओगी। बेहतर यही है, तुम यही रुको और तेज हवा का झोंका तेज़ी से निकल गया। यह देख चिड़िया चीखी, चिल्लायी, पछताई और रोने लगी, अपने नसीब को कोसने लगी। काश मैंने समय रहते ही, हवा के झोंके की की बात मान ली होती।
ज़िंदगी हवा के झोंके जैसी होती है। बार बार मौक़े देती रहती है। उड़ना ना उड़ना आप पर निर्भर है।
सागर की लहरे, एक छोटे कंकड को बडी तेजी से उछल उछल कर किनारे तक ले जा रही थी। उस कंकड को बडी खुशी हुई, ये सोचकर कि मै इन लहरो के किसी काम का तो हु नहीं, फिर भी ये लहरे कितना चाहती है मुझे। तभी तो मुझे अपने उपर उठाकर मेरे साथ आनंद से खेल रही है। कंकड ने और सोचा की 'मै कितना भाग्यशाली हूँ, जो मुझे ये तेज लहरे मीली, मेरा तो जीवन ही सफल हुँआ। उसे क्या पता था, जो लहरे उसके साथ आनंद से खेल रही है उनका तो यह स्वभाव है, की जो उनके काम का न हो, जो उन्हें भारी लगे, वो उसे दरकिनार कर देती है। फिर सागर में विलीन होकर, अपने जैसो के साथ ही असली आनंद ले पाती है। जब लहरे किनारे की और बढ़ती है, उन्हें भी लगता है वो खुद बढ़ रही है। लेकिन सच तो यह है की हवा उन्हे किनारे की और ढ़केल देती है।
वास्तविकता में देखा जाये तो ये एक फ़ोर्सफूल प्रोसेस है, मतलब हमारी भाषा मे जबरजस्ती की प्रक्रिया। पर देखने वालो ने, देखने मे ही गलती कर दी, लहरो को देखकर, वो हमेशा अपनी भावनावो के आवेश में, यही कहते और लिखते भी है, की लहरो को किनारा आकर्षित करता है, इसीलिए वो बार बार किनारे की ओर दौडती है। पर ये सही नहीं है। मेरी सोच तो ये है की, लहरो को किनारा कभी भी पसंद नहीं होता। इसीलिए उसे जो नापसंद है, वो भी वो बहा कर किनारेपर छोड देती है। उस भोलेभाले कंकड की भी यही दशा हुई उसे इतना उछलकर इसीलिए ले जा रहा था, ताकि वो दरकिनार हो सके ।
वो कंकड किनारेपर, लहरो के इंतजार मे रुका हुआ था। उसे लगा कि मुझे, लहरे वापस सागर ले जायेगी। और सागर में मेरे साथ आनंद से खेलेगी, पर जब भी लहरे आती, वो कंकड के थोडी दुरी से, सागर लौट जाती। कंकड ने बहुत इंतजार किया, चीखा, चिल्लाया पर किसी ने उसकी ना सुनी। ना खुदसे उठ पाता, ना उड पाता, बस वही पडा रहा। सुखा, गरम, ठंडा हर मौसम के साथ खुद को ढालता रहा।
अब कंकड ने, लहरो की उम्मीद छोड़ दी, उसने किनारे को अपना जीवन बना लिया। और जब गौर से किनारे को देखा, तो उसे पता चला की, उसके जैसे अनगीनत कंकड सागर कि लहरो ने, किनारेपर छोड दिए है। ये एक निरंतर प्रक्रिया है। उसने उस प्रक्रिया का स्वागत किया, मान लिया की वो भी एक इस प्रकृति का हिस्सा है। जैसा प्रकृति का नियम, वैसा गमन होना चाहिये। इसे मन मे ठानकर, किनारे को ठिकाना मान कर डटा रहा। उसने अब अपनी चारो ओर, बडी ध्यान से देखा की उन्ही अनगिनत कंकडो से, एक विशाल सागर का, किनारा बना है। किनारे की एक नई दुनिया बन गई है।और वो उसी नई दुनिया का एक हिस्सा था। एक श्याम, उस कंकड ने शांत मन से, अपने जैसे एक कंकड से पुछा, क्या तुम भी मेरे जैसा सोचते हो, की लहरे हमे किनारा कर देती है। तो उसने कहा हा बिलकूल ।
अब तुम ही देखो, जब लहरे किनारे की तरफ आती है, तब हवा के दबाव की जरूरत होती है। पर जब वापस जाती है, तो अपने आप, सहेज होकर जाती है। मतलब उसे सागर में ही रहना अच्छा लगता है। जीस प्रक्रिया को होने के लिए, किसी और माध्यम का दबाव होना जरूरी है, वो प्रेमपूर्वक होने का प्रतीक नही हो सकती। इस सत्य का स्विकार ही, अंतिम सत्त्य हो सकता है। दोनो कंकडोने हि नहीं, बल्की सारे किनारे ने ये स्वीकार कीया, और शांत हो गए। जब रात होती, तो किनारे के कंकड, चमकीले होने के कारन बडे सुंदर लगते . चाँद की रोशनी में चमकने की उनकी भी अपनी विशेषताये थी। सागर का पानी रात में डरावना लगता, पर किनारा सुंदर, शांत, शितल और चमकीला।
प्रकृति बडा खेल खेलती है। जब कुछ जीव समंदर से बाहर आते, वो किनारेपर ही अपने अंडे छूपाकर रखते, जब लोग पानी मे खेल खेल के थक जाते तो वो भी किनारे पर ही सुकून पाते। लहरो के लिए कंकडो का महत्व हो ना हो, पर प्रकृति की दृष्टी मे कंकडो से, किनारा बनता और वो भी उसके दुसरे जीवो के लिए उपयोगी हो जाता है। हमे लहरो या सागर की दुनिया मे रहकर अक्सर नही देखना चाहिए .उसके परे भी जीवन होता है। और वो भी उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना सागर का। इस विशाल सी दुनिया मे क्या सागर, क्या किनारा एक ही तो है।
हमारा जीवन सागर के जिवन जैसा ही है। हमारे आसपास के लोग, समाज, रिश्तेदार, हमारे अपने करीबी, हमारे साथी, हमारी भावनाएं, हमारे सुख दुःख, हमारे लिये एक विशाल सागर बन जाते है। जब इसी सागर की लहरे, हमे बेमतलब समझकर दरकिनार करती है, तो हम उस किनारे के कंकड की तरह महसुस करने लगते है। हम अकेले नही है, इस सागर में, सबको दरकिनार होना ही है . और एक दिन किनारे वाली दुनिया मे जाकर चमकना भी है। तो क्या सागर, क्या किनारा ।
एक दिन एक इंसान अकेले बैठकर रो रहा था। और ईश्वर को कोस रहा था। उसने कहा, प्रभू मेरे पास बंगला, गाडी, बीबी बच्चे, दोस्त, रिश्तेदार,नौकर चाकर सब है। फिर भी मै दुखी हूँ। ऐसा क्या कारण है, जो मुझे सबकुछ होते हुए भी दुखी रखता हैं। उसकी बाते सुनकर, ईश्वर मन ही मन मुस्कुराये और उन्होंने ठान लिया की आज इसे ज्ञान का अमृत पिला ही देता हूँ।
और तभी इंन्सान ने कहा, प्रभु क्या आप मुझपर प्रसन्न हुए हो, जो मुस्कुरा रहे हो। तो प्रभु ने कहाँ प्रसन्नता ही मेरा स्वभाव है। और रही बात तुम्हारे दुःख की, तो उसका कारण भी आज मै तुम्हे बता देता हूँ। . तुम्हारे दुःख का कारण है तुम्हारी समझ और उसमे पनपी तुम्हारी ना समझ वाली जिद्द है। मनुष्य ने कहा प्रभू, विस्तार से कहिये। तब उसपर ईश्वर कहते है, मनुष्य को समझ और ज्ञान न होने के कारण ओ उसी चीजो की जिद्द करता है, जिसकी उसको कोई समझ नही होती और वो अपने जीद के कारण उसी चीज को पा लेता है। पर संभाल नही पाता ।
तुम्हे माली बनना नही आता, और बगीचे मांग लेते हो। घर बसाना नही आता, और शहर माँग लेते हो। प्रेम करना नहीं आता, और आत्मा माँग लेते हो। राजा बनना नहीं आता, और सेवक माँग लेते हो। रिश्ता बनाना नही आता, और रिश्तेदार माँग लेते हो। दोस्ताना समझ नहीं आता, और दोस्त मांग लेते हो। परवरीश करनी नही आती, और बच्चे माँग लेते हो। किसीका दुःख समझ नहीं पाते, और सुख माँग लेते हो। नारायण बन नहीं पाते, और धनलक्ष्मी माँग लेते हो। जीवन के अर्थ से अंजान हो तुम, और एक नया जीवन माँग लेते हो।
राम के दुःख से भी लोगो को लगाव था, और रावण की सोने की लंका से घृणा। तुम ऊपर से कितना भी जिद्दी बनकर चीजे बटोरते रहो, पर तुम्हारे अंदर जो बैठा है, उसे तलाश राम की। इसीलिए तुम दुखी हो। मैं उन लोगो को भी वो सब दे देता हु, जो उसे संभाल नही पाते। उनकी जीद की वजह से वो मुझसे वो सब पा तो लेते है, लेकिन प् कर भी संभल नहीं पाते।
मै भी ईश्वर हूँ, ऐसे लोगो को मै ये सारी चीजे दे देता हू। और वो सब मुर्ख, इन्ही में उलझकर कर, दुखी होते है। पर जो असली चीज है, जो जीवन का सच्चा अमृत है, वो मै उनके लिये रखता हूँ, जो सारी चीजो के काबील हो कर भी, उन्ही चीजों को ऊपर उठाते है, जो कर्म मैंने उन्हे सोपें है और वो अपने उसी कर्मो से अमरता पा लेते है। वो खुद एक नया जीवन बन जाते है।