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Saturday, October 31, 2026

रामायण: भारत की आत्मा जब विश्व से संवाद करेगी !

एक फिल्म से बढ़कर—संस्कार, मर्यादा, नारी-शक्ति और मानवता का संदेश !

महर्षि वाल्मीकि के शब्दों से विश्व के हृदय तक—रामायण का शाश्वत संदेश, मर्यादा, संस्कार और मानवता का प्रकाश।

आज जब दुनिया कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), विज्ञान और आधुनिक तकनीक के साथ तेजी से आगे बढ़ रही है, तब भारत अपनी प्राचीन आध्यात्मिक विरासत के माध्यम से मानवता को जीवन के मूल्यों का स्मरण करा सकता है। इसी संदर्भ में रामायण पर आधारित आगामी फिल्म एक महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक अवसर प्रस्तुत करती है।

तकनीक हमें आगे बढ़ने के साधन देती है, लेकिन हमारे संस्कार हमें यह सिखाते हैं कि उस प्रगति का उपयोग किस दिशा में होना चाहिए। आधुनिकता और अध्यात्म का यह संतुलन आज के विश्व के लिए अत्यंत आवश्यक है।

रामायण: केवल एक कथा नहीं, जीवन-दर्शन

रामायण भारतीय संस्कृति की ऐसी अमूल्य धरोहर है, जिसने पीढ़ियों को सत्य, कर्तव्य, त्याग, करुणा और मर्यादा का महत्त्व समझाया है। प्रभु श्रीराम का चरित्र हमें उत्तरदायित्व और आदर्श आचरण की प्रेरणा देता है, जबकि माता सीता का व्यक्तित्व आत्मसम्मान, दृढ़ता और आंतरिक शक्ति का परिचय कराता है।

इसलिए, जब रामायण पर आधारित कोई फिल्म दुनिया भर के दर्शकों तक पहुँचती है, तो हमारा ध्यान केवल उसके दृश्यों, संगीत, वेशभूषा या कलाकारों के अभिनय तक सीमित नहीं रहना चाहिए। रणबीर कपूर प्रभु श्रीराम के रूप में कैसे दिखाई देते हैं? साई पल्लवी माता सीता के रूप में कैसी लगती हैं? फिल्म कितनी भव्य है? ये प्रश्न अपनी जगह महत्त्वपूर्ण हैं, लेकिन इन सबसे बड़ा प्रश्न है यह फिल्म हमें क्या सिखाना चाहती है?

इसके माध्यम से कौन-से विचार नई पीढ़ी तक पहुँचेंगे? क्या इसकी कथा हमें अपने जीवन और व्यवहार पर विचार करने के लिए प्रेरित करेगी? मेरे विचार में, ऐसी किसी भी फिल्म की वास्तविक सफलता को समझने के लिए उसके संदेश पर ध्यान देना आवश्यक है।

प्रभु श्रीराम: मर्यादा और उत्तरदायित्व के प्रतीक

भारतीय परंपरा में प्रभु श्रीराम को मर्यादा पुरुषोत्तम कहा जाता है। उनका आदर्श हमें सिखाता है कि महानता केवल शक्ति या सफलता प्राप्त करने में नहीं, बल्कि अपने कर्तव्यों को समझने और उचित आचरण करने में भी निहित है।

आज सफलता को अक्सर धन, प्रतिष्ठा और लोकप्रियता से मापा जाता है। लेकिन यदि इन उपलब्धियों के साथ ईमानदारी, करुणा और उत्तरदायित्व न हों, तो क्या वे समाज को सही दिशा दे सकती हैं? रामायण हमें ऐसे प्रश्नों पर विचार करने का अवसर देती है।

सत्य के प्रति निष्ठा, दूसरों के प्रति संवेदनशीलता और अपने कर्तव्यों का सम्मान ऐसे मूल्य हैं, जिनकी आवश्यकता हर समाज को है। इसीलिए, प्रभु श्रीराम का आदर्श केवल भारत के लिए ही नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के लिए प्रेरणा का स्रोत बन सकता है।

माता सीता: समर्पण के साथ स्वाभिमान की शक्ति

माता सीता के चरित्र को केवल त्याग और सहनशीलता तक सीमित करके देखना उनके व्यक्तित्व की गहराई को कम कर देना होगा। वे आत्मसम्मान, दृढ़ विचारों, नैतिक साहस और आंतरिक शक्ति का महत्त्वपूर्ण उदाहरण हैं। उनका चरित्र हमें यह समझने की प्रेरणा देता है कि कठिन परिस्थितियों में भी अपनी गरिमा और मूल्यों को पहचानना कितना आवश्यक है।

समर्पण का अर्थ स्वयं को खो देना नहीं है और सहनशीलता का अर्थ अपने स्वाभिमान से समझौता करना नहीं है।

आज के उपभोक्तावादी युग में व्यक्ति कभी-कभी लोकप्रियता, बाहरी आकर्षण और दूसरों की स्वीकृति पाने की इच्छा में अपने मूल्यों को पीछे छोड़ देता है। यह चुनौती केवल महिलाओं की नहीं, बल्कि पूरे समाज की है। माता सीता का व्यक्तित्व हमें याद दिलाता है कि मनुष्य का वास्तविक मूल्य उसके वस्त्रों, आभूषणों या बाहरी सुंदरता से निर्धारित नहीं होता। उसका चरित्र, विवेक और आत्मसम्मान भी उतने ही महत्त्वपूर्ण हैं।

इसलिए, फिल्म में माता सीता को देखते समय केवल उनकी वेशभूषा या सुंदरता पर चर्चा करने के बजाय हमें उनके व्यक्तित्व और विचारों में निहित संदेश को भी समझना चाहिए। नारी की वास्तविक शक्ति उसकी चेतना, आत्मसम्मान और अपने मूल्यों पर अडिग रहने के साहस में भी निहित है।

जब भारतीय संस्कृति विश्व के सामने आएगी

रामायण की अंतरराष्ट्रीय प्रस्तुति भारतीय संस्कृति को दुनिया के सामने समझने और समझाने का एक अवसर है। भारत में रामायण अनेक भाषाओं, कलाओं और परंपराओं के माध्यम से पीढ़ियों तक पहुँचती रही है। लेकिन दुनिया के अनेक दर्शकों के लिए यह कथा पहली बार किसी बड़े सिनेमाई अनुभव के माध्यम से सामने आ सकती है।

वे इसके पात्रों के साथ भारतीय सभ्यता की उन अवधारणाओं से भी परिचित हो सकते हैं, जिनमें कर्तव्य, न्याय, संबंध, त्याग और नैतिकता जैसे प्रश्न शामिल हैं। विशेष रूप से नई पीढ़ी के लिए यह भारत की सांस्कृतिक विरासत को जानने का एक माध्यम बन सकता है।

लेकिन इस अवसर के साथ हमारी जिम्मेदारी भी जुड़ी है। हमें अपनी संस्कृति को केवल भव्य दृश्यों और मनोरंजन के माध्यम से नहीं, बल्कि उसके मूल्यों और विचारों की गहराई के साथ भी प्रस्तुत करना चाहिए।

विरासत पर गर्व के साथ उसके मूल्यों का पालन भी आवश्यक

यहाँ एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न उठता है। यदि हम प्रभु श्रीराम की मर्यादा की बात करते हैं, तो क्या हम अपने जीवन में उसका पालन करने का प्रयास करते हैं? यदि हम माता सीता के स्वाभिमान को सम्मान देते हैं, तो क्या हम अपने समाज में महिलाओं की गरिमा और अधिकारों का सम्मान करते हैं?

किसी आदर्श की प्रशंसा करना सरल है, लेकिन उसके अनुरूप अपने आचरण को विकसित करना अधिक महत्त्वपूर्ण है। किसी संस्कृति की वास्तविक शक्ति केवल उसके प्राचीन ग्रंथों, मंदिरों या परंपराओं में नहीं होती। वह उन मूल्यों में भी होती है, जिन्हें उस संस्कृति के लोग अपने व्यवहार में जीवित रखते हैं।

संस्कृति का सबसे सुंदर परिचय वह नहीं है, जो हम दुनिया को बताते हैं, बल्कि वह है, जो दुनिया हमारे आचरण में देखती है।

यदि हम रामायण के आदर्शों को विश्व के सामने प्रस्तुत करते हैं, तो हमें अपने जीवन में सत्य, न्याय, करुणा और उत्तरदायित्व के लिए भी स्थान बनाना चाहिए। यही हमारी विरासत के प्रति सच्चा सम्मान होगा।

फिल्म से आगे: शब्दों और संदेश का महत्त्व

सिनेमा एक शक्तिशाली माध्यम है। उसके दृश्य, संगीत, संवाद और अभिनय दर्शकों के मन पर गहरा प्रभाव डाल सकते हैं। लेकिन किसी भी रचना की वास्तविक सार्थकता उसके कथ्य और संदेश में भी निहित होती है।

हम अक्सर चर्चा करते हैं कि किस कलाकार ने क्या पहना, कौन अधिक सुंदर दिखाई दिया या फिल्म कितनी भव्य बनी है। इन विषयों का अपना महत्त्व है, लेकिन रामायण जैसी सांस्कृतिक धरोहर पर आधारित फिल्म के संदर्भ में हमारी चर्चा इससे आगे भी बढ़नी चाहिए। हमें समझना चाहिए कि संवाद क्या कहते हैं, पात्रों के निर्णय हमें क्या सिखाते हैं और कथा हमारे भीतर कौन-से विचार जगाती है।

शब्द केवल बोले नहीं जाते; वे विचारों को जन्म देते हैं। और विचार ही समाज की दिशा निर्धारित करने में योगदान देते हैं। इसलिए, किसी फिल्म को देखते समय उसके संगीत और दृश्यों का आनंद लेने के साथ-साथ उसके संदेश को समझना भी आवश्यक है।

एक लेखिका के रूप में मेरा मानना है कि किसी सांस्कृतिक रचना का समर्थन करने का अर्थ उसे बिना प्रश्न किए स्वीकार करना नहीं है। हमें उसे खुले मन से देखना चाहिए, उसके सकारात्मक संदेशों को समझना चाहिए और आवश्यक होने पर विवेकपूर्ण समीक्षा भी करनी चाहिए। प्रशंसा हो या आलोचना, उसका आधार समझ, संवेदनशीलता और निष्पक्षता होना चाहिए।

मेरी कामना: रामायण का संदेश पूरी मानवता तक पहुँचे

मैं चाहती हूँ कि रामायण: पार्ट 1 एक सुंदर और प्रभावशाली सिनेमाई अनुभव बने। भारत सहित दुनिया भर के दर्शक इसे देखें, इसके पात्रों को समझें और इसकी कथा में निहित मानवीय मूल्यों पर विचार करें। मेरी सबसे बड़ी आशा यह है कि प्रभु श्रीराम का आदर्श हमें मर्यादा और उत्तरदायित्व का स्मरण कराए तथा माता सीता का व्यक्तित्व हमें आत्मसम्मान, दृढ़ता और आंतरिक शक्ति की प्रेरणा दे।

रामायण किसी एक भूभाग की सीमाओं में बँधी सांस्कृतिक विरासत नहीं है। इसके माध्यम से हम अपने कर्तव्यों, संबंधों, संघर्षों और नैतिक विकल्पों पर विचार कर सकते हैं। मानवता की कोई एक भाषा नहीं होती। सत्य, करुणा, न्याय और आत्मसम्मान जैसे मूल्यों का महत्त्व दुनिया की विभिन्न संस्कृतियों में समझा जा सकता है।

आज मेरी कामना है कि विज्ञान आगे बढ़े, तकनीक विकसित हो और नई पीढ़ी नए सपने देखे, लेकिन इस प्रगति के साथ मानवीय संवेदनाएँ और संस्कार भी जीवित रहें।

मेरे सभी पाठकों को हार्दिक शुभकामनाएँ। आइए, हम प्रभु श्रीराम और माता सीता के आदर्शों को केवल श्रद्धा से नमन ही न करें, बल्कि उनके मूल्यों को अपने जीवन में उतारने का प्रयास भी करें।

मेरे राम पधारो—फिर से मानवता के आँगन में, फिर से संस्कारों के दीप जलाने, फिर से मर्यादा, सत्य और करुणा का प्रकाश फैलाने।

प्रार्थना है कि रामायण का संदेश सीमाओं से परे जाकर प्रत्येक हृदय में सद्भाव, शांति और मानवता की भावना को जागृत करे। दुनिया आगे बढ़े विज्ञान के साथ, तकनीक के साथ और संस्कारों के साथ।

मेरे राम पधारो… और मानवता के हृदय में सत्य, शांति और करुणा का प्रकाश सदैव जीवित रहे।

— रानमोती द्वारा लिखित

Thursday, October 8, 2026

वह सच्चा प्रशंसक था… दोनों हाथों में घड़ियाँ, गले में पेन का साज और मन में एक अधूरी आस..

वह सच्चा प्रशंसक था…

दोनों हाथों में घड़ियाँ, गले में पेन का साज और मन में एक अधूरी आस..


आज सुबह नाना पाटेकर जी के निधन की खबर सुनी तो कुछ देर तक मन जैसे ठहर-सा गया।

कुछ कलाकार ऐसे होते हैं, जिन्हें हम केवल पर्दे पर देखते हैं। उनके अभिनय की तारीफ करते हैं, उनकी फिल्में देखते हैं और फिर अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में लौट जाते हैं।

लेकिन कुछ कलाकार ऐसे होते हैं, जो धीरे-धीरे हमारी स्मृतियों का हिस्सा बन जाते हैं। उनकी आवाज़, उनका चेहरा, उनका कोई संवाद या उनका निभाया हुआ कोई किरदार—कहीं न कहीं हमारे भीतर रह जाता है।

नाना पाटेकर उन्हीं कलाकारों में से एक थे।

उनके अभिनय में बनावट नहीं थी। संवाद बोलते हुए ऐसा लगता था जैसे शब्द लिखे हुए नहीं, बल्कि भीतर से निकल रहे हों। उनकी आवाज़ में एक ऐसी सच्चाई थी, जो सीधे दिल तक पहुँचती थी।

और आज उनके जाने की खबर ने मुझे लगभग दस-पंद्रह दिन पहले की एक छोटी-सी मुलाकात फिर से याद दिला दी।

एक ऐसी मुलाकात, जिसे उस समय शायद हमने सामान्य-सी घटना समझा था।

लेकिन आज लगता है, वह मुलाकात अपने भीतर एक पूरी कहानी समेटे हुए थी।


हम मध्य प्रदेश के महेश्वर, जिला खरगोन गए थे।

नर्मदा के किनारे बसा महेश्वर—इतिहास, आस्था और शांत बहती नदी के बीच खड़ा एक सुंदर शहर। देवी अहिल्याबाई होलकर की स्मृतियों से जुड़ी इस नगरी में हम देवी अहिल्याबाई होलकर के महल के पास स्थित बांके बिहारी भोजनालय में भोजन करने गए थे।

हम खाना खाने बैठे ही थे कि एक बुज़ुर्ग व्यक्ति हमारे पास आकर खड़े हो गए।

उम्र लगभग अस्सी-बयासी वर्ष रही होगी।

शरीर बहुत दुबला-पतला था। चेहरे पर उम्र की गहरी रेखाएँ थीं। लेकिन आँखों में एक अजीब-सी चमक थी—जैसे जिंदगी ने उन्हें बहुत कुछ दिखाया हो, मगर उनकी जिज्ञासा अभी भी खत्म न हुई हो।

और सबसे पहली चीज़ जिसने मेरा ध्यान खींचा, वह थीं उनकी घड़ियाँ।

उनके दोनों हाथों में कई घड़ियाँ थीं।

कुछ पुरानी, कुछ नई।

मैं खुद को रोक नहीं पाई और पूछ बैठी—

“आपने इतनी सारी घड़ियाँ क्यों पहन रखी हैं?”

उन्होंने मेरी ओर देखा और बहुत सहजता से कहा—

“जीवन एक संघर्ष है… और ये घड़ियाँ समय का प्रतीक हैं। पुराना समय और नया समय… दोनों को साथ लेकर चल रहा हूँ।”

मैं कुछ क्षण चुप रह गई।

कितना साधारण-सा उत्तर था।

लेकिन उस उम्र के एक व्यक्ति के मुँह से निकला वही साधारण वाक्य अचानक बहुत गहरा लगने लगा।

पुराना समय और नया समय… दोनों को साथ लेकर चलना।

शायद यही तो जीवन है।

लेकिन उनकी कहानी में अभी और भी बहुत कुछ था।

उनके पास दस-पंद्रह अलग-अलग पेन भी थे।

मेरे बेटे ने उन्हें देखा तो उससे भी रहा नहीं गया। उसने पूछ लिया—

“दादाजी, आपके पास इतने सारे पेन क्यों हैं?”

बुज़ुर्ग ने मुस्कुराकर उसकी ओर देखा और कहा—

“अगर कोई स्कूल का बच्चा या कोई भी बच्चा मुझसे कहता है—‘दादाजी, कुछ दे दो’… तो मैं इनमें से एक पेन निकालकर उसे दे देता हूँ।”

उनका जवाब सुनकर हम कुछ क्षण उन्हें देखते ही रह गए।

किसी बच्चे के हाथ में चॉकलेट रख देना आसान है।

कोई टॉफी दे देना भी आसान है।

लेकिन किसी बच्चे के हाथ में पेन देना और उसके पीछे एक सोच रखना—यह बात अलग थी।

उनका मानना था कि अगर कोई बच्चा उनसे कुछ माँगता है, तो उसे ऐसी चीज़ दी जाए जो उसे पढ़ाई की ओर ले जाए।

एक पेन—शायद छोटी-सी चीज़ थी, लेकिन उनके लिए वह शिक्षा का संदेश था।

वे अपनी तरह से बच्चों को पढ़ाई के लिए प्रेरित करना चाहते थे। उन्हें यह एहसास दिलाना चाहते थे कि हाथ में पकड़ा हुआ पेन केवल लिखने की वस्तु नहीं, बल्कि आगे बढ़ने का एक साधन भी हो सकता है।

उस उम्र में भी उनके भीतर बच्चों की पढ़ाई को लेकर इतनी चिंता थी।

मुझे लगा, कुछ लोग उम्र के साथ बूढ़े होते हैं…

और कुछ लोग उम्र के साथ और गहरे होते जाते हैं।

भोलेजी शायद उन्हीं लोगों में से थे।

बातचीत आगे बढ़ी तो पता चला कि उनका नाम भोले था।

वे मूल रूप से मध्य प्रदेश के रहने वाले नहीं थे। महाराष्ट्र के एक ब्राह्मण परिवार से उनका संबंध था। वे कभी मुंबई में भी रहे थे, लेकिन वहाँ टिक नहीं सके और बाद में मध्य प्रदेश लौट आए।

वे मुझसे हिंदी में बातें कर रहे थे।

बातों-बातों में उन्होंने अचानक कहा—

“तुम बिल्कुल मेरी भतीजी जैसी दिखती हो।”

उनकी आँखों में उस समय जो अपनापन था, वह औपचारिक नहीं था।

शायद मुझे देखकर उन्हें सचमुच अपनी भतीजी याद आ गई थी।

मेरे पति भी मेरे साथ थे। भोलेजी उनसे भी बड़ी आत्मीयता से बातें करने लगे।

फिर अचानक बातचीत के बीच उन्होंने एक बात कही—

“मुझे मुंबई जाना है।”

मेरे पति ने पूछा—

“मुंबई क्यों जाना है?”

उन्होंने बिना किसी झिझक के कहा—

“मुझे नाना पाटेकर से मिलना है।”

बस।

इतना-सा वाक्य।

लेकिन उस एक वाक्य ने जैसे पूरी बातचीत का रुख बदल दिया।

मैंने उनकी ओर देखा।

अस्सी-बयासी साल का एक बुज़ुर्ग।

दुबला-पतला शरीर।

दोनों हाथों में घड़ियाँ।

गले में पेन।

जिंदगी की न जाने कितनी मुश्किलों और उतार-चढ़ावों से गुजर चुका इंसान।

लेकिन उसके भीतर अभी भी एक इच्छा उतनी ही जीवित थी, जितनी शायद किसी युवा प्रशंसक के मन में होती है।

नाना पाटेकर से एक बार मिलना।

मेरे पति ने उनसे पूछा—

“नाना पाटेकर से ही क्यों मिलना है?”

यह सवाल सुनते ही उनके चेहरे पर एक अलग चमक आ गई।

उन्होंने कहा—

“नाना पाटेकर जैसा कलाकार मैंने कभी नहीं देखा। मैं उनका बहुत बड़ा प्रशंसक हूँ। उनका अभिनय… उनकी आवाज़… उनका संवाद बोलने का तरीका… सब कुछ दिल को छू जाता है। वो जो बोलते हैं, वो सिर्फ बोलते नहीं—महसूस करवाते हैं।”

उस समय उनके चेहरे को देखना अपने आप में एक अनुभव था।

वह किसी प्रसिद्ध अभिनेता का नाम लेते हुए केवल उत्साहित नहीं थे।

वह जैसे अपने किसी प्रिय व्यक्ति के बारे में बात कर रहे थे।

और तभी मेरे मन में एक सवाल आया—

आखिर सच्चा प्रशंसक होता कौन है?

क्या वह, जो किसी कलाकार की फिल्म देखता है?

क्या वह, जो उसकी तस्वीर लगाता है?

क्या वह, जो सोशल मीडिया पर उसके निधन के बाद श्रद्धांजलि लिखता है?

या वह, जिसके जीवन के अंतिम पड़ाव में भी उस कलाकार से मिलने की इच्छा बची रहती है?

शायद…

वही सच्चा प्रशंसक होता है।

मेरे पति ने भोलेजी से कहा—

“आप जब भी मुंबई आएँ, हमें जरूर बताइएगा। हम अपनी तरफ से पूरी कोशिश करेंगे कि आपकी नाना पाटेकर से मुलाकात हो सके।”

हम जानते थे कि हम कोई निश्चित वादा नहीं कर सकते।

किसी कलाकार से मुलाकात हो जाएगी, इसकी गारंटी देना हमारे हाथ में नहीं था।

लेकिन उनकी इच्छा को हल्के में लेना भी हमें ठीक नहीं लगा।

इसलिए हमने बस इतना कहा कि—

अगर भोलेजी मुंबई आएँगे, तो हम अपनी तरफ से पूरी कोशिश जरूर करेंगे।

उस समय हमें क्या पता था कि कुछ ही दिनों बाद हालात इतने बदल जाएंगे।

आज नाना पाटेकर हमारे बीच नहीं हैं।

और आज जब उनके जाने का दुख पूरे देश में है, तब महेश्वर के उस बांके बिहारी भोजनालय में हुई वह मुलाकात बार-बार आँखों के सामने आ रही है।

मन में एक सवाल उठता है—

भोलेजी को यह खबर मिली होगी तो उनके मन पर क्या गुज़री होगी?

जिस व्यक्ति से मिलने की इच्छा उन्होंने इतने विश्वास से अपने मन में सँजो रखी थी…

जिसके लिए उन्होंने कहा था—

“मुझे नाना पाटेकर से मिलना है…”

वह इच्छा शायद अब अधूरी ही रह गई।

शायद वह मुलाकात कभी नहीं हो पाएगी।

और यही सोचकर मन में एक अजीब-सी उदासी उतर आती है।

लेकिन उस मुलाकात ने मुझे नाना पाटेकर की लोकप्रियता का एक ऐसा रूप दिखाया, जो शायद किसी पुरस्कार, सम्मान या बॉक्स ऑफिस के आँकड़े से कहीं बड़ा है।

किसी कलाकार का किसी अनजान इंसान के मन में अपने लिए मिलने की ऐसी तड़प पैदा कर देना—यही तो कला की असली ताकत है।

नाना पाटेकर केवल किरदार निभाते नहीं थे।

वे उन्हें जीते थे।

उनकी आवाज़ में शब्द होते थे, लेकिन उन शब्दों के पीछे भावनाएँ होती थीं।

उनके अभिनय में दिखावा नहीं था।

एक कच्चापन था।

एक सच्चाई थी।

और शायद इसी कारण वे पर्दे से निकलकर लोगों के जीवन का हिस्सा बन गए।

आज एक बड़ा कलाकार चला गया।

एक बड़ी आवाज़ शांत हो गई।

एक असाधारण अभिनय यात्रा थम गई।

लेकिन कलाकार की जिंदगी केवल उसके जाने तक नहीं होती।

वह उसके बाद भी चलती रहती है—

उसके किरदारों में,

उसके संवादों में,

उसकी आवाज़ में,

और उन लोगों की यादों में, जिनके दिल में उसने कभी जगह बनाई थी।

मेरे लिए नाना पाटेकर की आज की सबसे बड़ी याद कोई पुरस्कार नहीं है।

कोई प्रसिद्ध संवाद भी नहीं।

मेरी आँखों के सामने तो बस महेश्वर के उस बांके बिहारी भोजनालय में मिले भोलेजी हैं।

एक दुबला-पतला, वृद्ध व्यक्ति…

दोनों हाथों में तरह-तरह की घड़ियाँ…

गले में दस-पंद्रह पेन…

किसी बच्चे के “दादाजी, कुछ दे दो” कहने पर अपनी पेन में से एक पेन निकालकर उसके हाथ में रख देने वाला…

चॉकलेट के बजाय पेन देकर बच्चों को पढ़ाई और शिक्षा की ओर प्रेरित करने वाला…

और अपने मन में एक ऐसी इच्छा सँजोए हुए, जो शायद अब कभी पूरी नहीं होगी—

“मुझे नाना पाटेकर से मिलना है।”

आज उस अनजान प्रशंसक की याद आ रही है।

और उसके साथ याद आ रहे हैं नाना पाटेकर।

शायद यही किसी कलाकार की सबसे बड़ी उपलब्धि है—

कि उसके जाने के बाद भी कोई दूर किसी छोटे-से शहर में बैठा व्यक्ति उसे याद करे और कहे—

“मैं उनसे एक बार मिलना चाहता था…”

नाना पाटेकर को भावपूर्ण श्रद्धांजलि। 🙏

नाना, आप चले गए…
लेकिन आपकी कला, आपकी आवाज़ और आपके अभिनय की वह सच्चाई
असंख्य दिलों में हमेशा जीवित रहेगी।

- रानमोती / Ranmoti

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