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Saturday, August 8, 2026

सोने के खजाने पर बैठा भिखारी

एक गाँव में एक भिखारी रहता था।

वह रोज़ एक पुराने घर के सामने बनी छोटी-सी खाली जगह पर बैठकर, अपने फटे-पुराने कपड़ों में, हाथ में कटोरा लेकर भीख माँगता था।

राहगीर उसे कुछ सिक्के दे देते, और उन्हीं थोड़े-थोड़े पैसों से वह अपना जीवन किसी तरह गुज़ारता था।

लेकिन उसे एक बात का बिल्कुल भी पता नहीं था कि जिस जगह पर वह वर्षों से बैठा था, ठीक उसी जमीन के नीचे सोने का एक विशाल खजाना दबा हुआ था।

वह हर दिन उस खजाने के ऊपर बैठकर भीख माँगता रहा, पर कभी उसे यह एहसास नहीं हुआ कि जिस दौलत की तलाश में वह दुनिया से माँग रहा है, वह तो उसके पैरों के नीचे ही दबी हुई है।

समय बीतता गया। एक दिन उस भिखारी की मृत्यु हो गई।

कुछ समय बाद लोगों ने उस पुराने घर को तोड़कर वहाँ खुदाई शुरू की। खुदाई के दौरान उन्हें जमीन के नीचे से सोने का एक विशाल खजाना मिला।

यह देखकर सब लोग आश्चर्यचकित रह गए और हँसते हुए बोले—

“कैसी विडंबना है! जिसने पूरी ज़िंदगी सोने के खजाने पर बैठकर फटे कपड़ों में भीख माँगी, उसे कभी यह पता ही नहीं चला कि असली दौलत तो उसके अपने पैरों के नीचे थी।”

सीख

हम में से बहुत-से लोग भी उस भिखारी की तरह होते हैं।
हम अपनी खुशियों, अपनी ताकत, अपनी प्रतिभा और अपने भीतर छिपे अनमोल खजाने को पहचान नहीं पाते। हम बाहर सुख और सफलता खोजते रहते हैं, जबकि हमारी सबसे बड़ी संपत्ति हमारे अपने भीतर ही होती है।

जो अपने भीतर छिपे खजाने को पहचान लेता है,
उसे दुनिया से माँगने की ज़रूरत नहीं पड़ती।

-लेखिका : रानमोती / RANMOTI


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