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Tuesday, December 1, 2020

बादशाह का न्यौता



वैसे तो ख़ुद कभी लड़ते नहीं थे
सहने की आदत जो पड़ी थी
दिन रात पसीना बहाकर ख़ुदका
दुसरो की इबादत नसीब से जुड़ी थी

नजाने इसबार कैसे हिम्मत जुटाई
बादशाह को घेर चारो तरफ रोक लगाई
बीके हुए तोतों ने शुरू की बात गन्दी
आवाज़ दबाने निश्चित की नाकाबंदी

उम्मीद की न कोई किरण थी
इरादो में फिरयाद फिर भी शुरू थी
खुदका वजूद ढूंढ़ने की पहल हुई थी
अपनेही हक़ के ख़ातिर जंग छेडी थी

बादशाह अमीरों का ठेकेदार था
गरीबोंकी बर्बादी का असल दावेदार था
फिर भी प्रजा के सामने शानदार था
उसका झूठा चहरा बड़ा वजनदार था

धुप में तपे चेहरों से सच बयां हो रहे थे
फिर भी तोतों के मुंह झूठ परोस रहे थे
बादशाह कैसे कामयाब है बता रहे थे
अपने बोली की कीमत चूका रहे थे

सत्य की ज्वाला भड़कने से पहले
बादशाह की खुर्सी टूटने से पहले
अपनी झूटी प्रतिमा को बचाने खातिर
बादशाह ने चर्चा का न्यौता दिया आखिर

- रानमोती / Ranmoti
(इमेज सोर्स-अमर उजाला)

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