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Friday, October 23, 2026

चिकित्सा नोबेल 2026: रोशनी से खुलेगा दिमाग के रहस्यों का रास्ता

ऑप्टोजेनेटिक्स की खोज ने मस्तिष्क अनुसंधान को दी नई दिशा। प्रकाश-संवेदनशील प्रोटीनों की मदद से वैज्ञानिक अब विशिष्ट तंत्रिका कोशिकाओं की गतिविधियों को नियंत्रित कर यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि यादें, भावनाएँ और व्यवहार कैसे आकार लेते हैं।

विज्ञान की दुनिया में ऐतिहासिक उपलब्धि

मानव मस्तिष्क प्रकृति की सबसे जटिल संरचनाओं में से एक है। हमारी सोच, भावनाएँ, यादें, शारीरिक गतिविधियाँ और व्यवहार—इन सबके पीछे अरबों तंत्रिका कोशिकाओं का एक विशाल नेटवर्क काम करता है। लेकिन ये कोशिकाएँ आपस में कैसे संवाद करती हैं? उनकी गतिविधियाँ हमारे व्यवहार को किस तरह प्रभावित करती हैं? और मस्तिष्क की अलग-अलग प्रक्रियाओं के पीछे कौन-से तंत्र काम करते हैं? इन सवालों के जवाब तलाशना आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की बड़ी चुनौतियों में शामिल है।

वर्ष 2026 के शरीरक्रिया विज्ञान अथवा चिकित्सा के नोबेल पुरस्कार ने इस दिशा में हुई एक महत्त्वपूर्ण वैज्ञानिक उपलब्धि को वैश्विक पहचान दी है। अमेरिकी वैज्ञानिक कार्ल डाइसरॉथ और जर्मनी के वैज्ञानिक पीटर हेगेमन तथा जॉर्ज नागेल को प्रकाश-संवेदनशील आयन चैनलों और ऑप्टोजेनेटिक्स से जुड़े उनके योगदान के लिए संयुक्त रूप से सम्मानित किया गया है। इस तकनीक ने वैज्ञानिकों को मस्तिष्क की चुनिंदा तंत्रिका कोशिकाओं की गतिविधियों को प्रकाश की मदद से नियंत्रित करने का नया तरीका दिया है।

इस खोज का मूल विचार जितना सरल है, उसका वैज्ञानिक महत्त्व उतना ही व्यापक है—क्या प्रकाश की मदद से मस्तिष्क की खास कोशिकाओं को सक्रिय या शांत करके उनके कामकाज को समझा जा सकता है?

ऑप्टोजेनेटिक्स ने इस सवाल की पड़ताल के लिए विज्ञान के सामने नई संभावनाएँ खोल दी हैं।

तीन वैज्ञानिकों का योगदान

कार्ल डाइसरॉथ: प्रकाश से तंत्रिका कोशिकाओं को नियंत्रित करने की दिशा

अमेरिका के स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक कार्ल डाइसरॉथ ने ऑप्टोजेनेटिक्स को मस्तिष्क के अध्ययन की उपयोगी तकनीक बनाने में अहम भूमिका निभाई।

उनके और उनके सहयोगियों के शोध ने दिखाया कि प्रकाश-संवेदनशील प्रोटीनों की मदद से तंत्रिका कोशिकाओं की गतिविधियों को नियंत्रित किया जा सकता है। वर्ष 2005 में प्रकाशित एक महत्त्वपूर्ण अध्ययन में चैनलरोडॉप्सिन प्रोटीन का उपयोग करके तंत्रिका कोशिकाओं में विद्युत गतिविधि उत्पन्न करने का प्रदर्शन किया गया।

इससे वैज्ञानिकों के लिए केवल मस्तिष्क की गतिविधियों को देखना ही नहीं, बल्कि चुनिंदा कोशिकाओं की गतिविधि बदलकर उसके परिणामों का अध्ययन करना भी संभव हुआ।

पीटर हेगेमन: प्रकाश को पहचानने वाली जैविक प्रणाली का अध्ययन

जर्मनी के हम्बोल्ट विश्वविद्यालय से जुड़े वैज्ञानिक पीटर हेगेमन ने सूक्ष्मजीवों की प्रकाश के प्रति प्रतिक्रिया को समझने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

उनके शोध का एक प्रमुख विषय क्लैमाइडोमोनास नामक एककोशिकीय हरा शैवाल था। यह सूक्ष्म जीव अपने आसपास के प्रकाश के प्रति प्रतिक्रिया करता है। इसका अध्ययन करते हुए वैज्ञानिकों ने उन जैविक तंत्रों को समझना शुरू किया, जिनसे प्रकाश-संवेदनशील प्रोटीनों की कार्यप्रणाली का पता चला।

जॉर्ज नागेल: प्रकाश-संवेदनशील प्रोटीनों की भूमिका

जर्मनी के वुर्ज़बर्ग विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक जॉर्ज नागेल ने चैनलरोडॉप्सिन नामक प्रकाश-संवेदनशील प्रोटीनों की पहचान और उनकी कार्यप्रणाली को समझने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

उचित प्रकाश पड़ने पर ये प्रोटीन आयन चैनलों की तरह काम करते हैं। इनके माध्यम से विद्युत आवेश वाले कण, यानी आयन, कोशिका की झिल्ली से गुजर सकते हैं। इससे कोशिका की विद्युत गतिविधि में बदलाव आता है।

इन तीनों वैज्ञानिकों के योगदान ने मिलकर एक नई तकनीक की नींव रखी—जिसमें सूक्ष्म जीवों में प्रकाश के प्रति प्रतिक्रिया करने वाली प्रणाली का उपयोग मस्तिष्क की तंत्रिका कोशिकाओं के अध्ययन में किया जा सकता है।

क्या है ऑप्टोजेनेटिक्स?

ऑप्टोजेनेटिक्स ऐसी वैज्ञानिक तकनीक है, जिसमें आनुवंशिक विज्ञान और प्रकाश-आधारित तरीकों को मिलाकर विशिष्ट कोशिकाओं की गतिविधियों का नियंत्रण किया जाता है।

इस प्रक्रिया में चुनी हुई कोशिकाओं में ऐसे प्रकाश-संवेदनशील प्रोटीन बनाने के लिए आनुवंशिक निर्देश पहुँचाए जाते हैं। इसके बाद नियंत्रित प्रकाश डालकर इन कोशिकाओं की गतिविधियों में बदलाव किया जा सकता है। इस्तेमाल किए गए प्रोटीन और प्रयोग की व्यवस्था के अनुसार, वैज्ञानिक कोशिकाओं को सक्रिय कर सकते हैं या उनकी गतिविधि कम कर सकते हैं।

इस तकनीक की खासियत यह है कि इससे मस्तिष्क में कारण और परिणाम के संबंध को समझने में मदद मिलती है। उदाहरण के लिए, यदि किसी विशेष व्यवहार के दौरान कुछ तंत्रिका कोशिकाएँ सक्रिय होती हैं, तो केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि वे सक्रिय थीं। वैज्ञानिक यह भी जानना चाहते हैं कि उन कोशिकाओं की गतिविधि बदलने पर व्यवहार में क्या परिवर्तन आता है।

ऑप्टोजेनेटिक्स इसी तरह के सवालों की जाँच करने का अवसर देता है। इससे सीखने, स्मरणशक्ति, भावनाओं, गति और व्यवहार से जुड़े तंत्रिका नेटवर्क का अध्ययन किया जा सकता है।

एक सूक्ष्म शैवाल से मस्तिष्क विज्ञान तक का सफर

इस खोज का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि इसकी शुरुआत मानव मस्तिष्क से नहीं, बल्कि एक छोटे-से हरे शैवाल के अध्ययन से हुई।

क्लैमाइडोमोनास प्रकाश को पहचानकर अपनी गति में बदलाव कर सकता है। वैज्ञानिक यह समझना चाहते थे कि यह सूक्ष्म जीव प्रकाश को कैसे पहचानता है और उसके प्रति प्रतिक्रिया कैसे करता है। इसी शोध से चैनलरोडॉप्सिन जैसे प्रोटीनों की भूमिका सामने आई।

बाद में वैज्ञानिकों ने इन प्रोटीनों का उपयोग तंत्रिका कोशिकाओं में प्रकाश के माध्यम से विद्युत गतिविधि उत्पन्न करने के लिए किया। वर्ष 2005 में हुए प्रयोगों ने इस दिशा में महत्त्वपूर्ण सफलता दिखाई। इसके बाद जीवित पशुओं के मस्तिष्क में भी इस तकनीक का उपयोग किया गया और ऑप्टोजेनेटिक्स आधुनिक तंत्रिका विज्ञान का एक महत्त्वपूर्ण उपकरण बन गया।

यह यात्रा बताती है कि प्रकृति की किसी छोटी-सी जैविक प्रक्रिया को समझने की कोशिश भी आगे चलकर चिकित्सा विज्ञान के लिए बड़ा बदलाव ला सकती है।

चिकित्सा विज्ञान के लिए क्यों अहम है यह खोज?

मानव मस्तिष्क में अरबों तंत्रिका कोशिकाएँ एक-दूसरे से जुड़ी होती हैं। इनका नेटवर्क हमारी गति, संवेदनाओं, सीखने, स्मृति और भावनात्मक प्रतिक्रियाओं को प्रभावित करता है। इन प्रक्रियाओं में अलग-अलग कोशिकाओं की भूमिका समझना वैज्ञानिकों के लिए बड़ी चुनौती है।

ऑप्टोजेनेटिक्स इस जटिल नेटवर्क के चुनिंदा हिस्सों का अध्ययन करने का एक सटीक तरीका उपलब्ध कराता है।

1. मस्तिष्क संबंधी बीमारियों को समझना

पार्किंसन रोग, मिर्गी और अल्जाइमर जैसी स्थितियों में तंत्रिका नेटवर्क की भूमिका समझने के लिए वैज्ञानिक ऑप्टोजेनेटिक्स का उपयोग प्रायोगिक शोध में करते हैं। इससे बीमारी से जुड़े जैविक तंत्रों को समझने और भविष्य के संभावित उपचार लक्ष्यों की पहचान करने में मदद मिल सकती है।

2. स्मरणशक्ति और व्यवहार का अध्ययन

यादें कैसे बनती हैं? सीखने की प्रक्रिया में कौन-से तंत्रिका नेटवर्क सक्रिय होते हैं? भावनात्मक प्रतिक्रियाएँ किस तरह उत्पन्न होती हैं? चुनिंदा तंत्रिका कोशिकाओं की गतिविधियों में बदलाव करके वैज्ञानिक इन सवालों की जाँच कर सकते हैं।

3. भविष्य के उपचारों की संभावनाएँ

वैज्ञानिक यह भी तलाश रहे हैं कि प्रकाश-संवेदनशील प्रोटीनों का उपयोग कुछ विशेष बीमारियों के उपचार में भविष्य में किया जा सकता है या नहीं। दृष्टि संबंधी कुछ स्थितियों में भी ऑप्टोजेनेटिक तरीकों से दृष्टि के कुछ कार्यों को आंशिक रूप से बहाल करने की संभावनाओं पर शोध किया जा रहा है।

हालाँकि, इन संभावित उपयोगों को लेकर सावधानी जरूरी है। ऑप्टोजेनेटिक्स अभी मुख्य रूप से अनुसंधान की तकनीक है। इसके अनेक चिकित्सकीय उपयोग प्रयोगात्मक अवस्था में हैं और उनकी सुरक्षा तथा प्रभावशीलता स्थापित करने के लिए आगे और अध्ययन आवश्यक हैं।

विज्ञान और सहयोग की जीत

ऑप्टोजेनेटिक्स की सफलता यह भी दिखाती है कि आधुनिक विज्ञान में अलग-अलग विषयों के बीच सहयोग कितना महत्त्वपूर्ण है। इस खोज में आणविक जीव विज्ञान, भौतिकी, आनुवंशिकी, प्रकाशिकी और तंत्रिका विज्ञान का ज्ञान एक साथ आया।

एक क्षेत्र में हुई मूलभूत खोज दूसरे क्षेत्र में नई तकनीक का आधार बन सकती है। वैज्ञानिक जब किसी जैविक प्रक्रिया को समझने का प्रयास करते हैं, तब उन्हें हमेशा यह पता नहीं होता कि उस ज्ञान का भविष्य में कहाँ उपयोग होगा। लेकिन ऐसे शोध आगे चलकर चिकित्सा और तकनीक में नई संभावनाओं का रास्ता खोल सकते हैं।

एक सूक्ष्म शैवाल में प्रकाश-संवेदनशील प्रोटीनों के अध्ययन से शुरू हुई यह यात्रा आज जीवित मस्तिष्क में तंत्रिका कोशिकाओं की गतिविधियों को समझने में मदद कर रही है।

निष्कर्ष: प्रकाश से ज्ञान की नई राह

वर्ष 2026 का चिकित्सा नोबेल पुरस्कार उस वैज्ञानिक उपलब्धि को सम्मानित करता है जिसने मस्तिष्क के अध्ययन का तरीका बदल दिया है। कार्ल डाइसरॉथ, पीटर हेगेमन और जॉर्ज नागेल के योगदान ने वैज्ञानिकों को यह समझने के लिए एक शक्तिशाली साधन दिया है कि तंत्रिका कोशिकाओं की गतिविधियाँ स्मृति, भावनाओं और व्यवहार से किस तरह जुड़ी हैं।

इसका अर्थ यह नहीं कि मस्तिष्क के सभी रहस्य सुलझ गए हैं या न्यूरोलॉजिकल बीमारियों का इलाज तुरंत संभव हो गया है। लेकिन यह खोज वैज्ञानिकों को अधिक सटीक प्रयोग करने और मस्तिष्क की कार्यप्रणाली को बेहतर ढंग से समझने का अवसर देती है।

कभी-कभी विज्ञान की बड़ी उपलब्धि किसी बड़े सवाल से नहीं, बल्कि प्रकृति के एक छोटे-से रहस्य को समझने की जिज्ञासा से शुरू होती है। इस मामले में, एक सूक्ष्म जीव की प्रकाश के प्रति प्रतिक्रिया का अध्ययन मानव मस्तिष्क को समझने की दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम बन गया।

यही विज्ञान की असली ताकत है—जिज्ञासा से शुरू हुई खोज ज्ञान के ऐसे नए द्वार खोल सकती है, जिनका महत्त्व आने वाली पीढ़ियों तक बना रहता है।

- रानमोती / Ranmoti
(लेखिका कृषि रसायनशास्त्र में स्नातकोत्तर हैं। वे कृषि विशेषज्ञ एवं शोधकर्ता हैं।)

वैद्यकशास्त्रातील नोबेल पुरस्कार २०२६: प्रकाशाच्या साहाय्याने उलगडणार मानवी मेंदूची रहस्ये!

प्रकाशसंवेदनशील प्रथिनांच्या साहाय्याने मेंदूतील विशिष्ट चेतापेशींवर नियंत्रण ठेवणारे ऑप्टोजेनेटिक्स हे तंत्र मेंदूची रहस्ये उलगडण्यास, मज्जासंस्थेच्या विकारांचा अभ्यास करण्यास आणि भविष्यातील संभाव्य उपचारपद्धती विकसित करण्यास नवी दिशा देत आहे.

विज्ञानविश्वातील ऐतिहासिक संशोधन

मानवी मेंदू ही निसर्गातील सर्वाधिक गुंतागुंतीच्या रचनांपैकी एक. विचार, भावना, स्मरणशक्ती, हालचाली आणि वर्तन अशा असंख्य प्रक्रियांचे नियंत्रण मेंदूतील अब्जावधी चेतापेशींच्या माध्यमातून होत असते. या पेशी एकमेकांशी कशा संवाद साधतात, त्यांच्यातील संदेशवहन कसे घडते आणि मेंदूच्या विविध कार्यांमागील यंत्रणा नेमकी कशी असते, हे समजून घेणे आधुनिक विज्ञानापुढील मोठे आव्हान राहिले आहे.

२०२६ च्या शरीरक्रियाशास्त्र किंवा वैद्यकशास्त्रातील नोबेल पुरस्काराने या क्षेत्रातील एका महत्त्वपूर्ण वैज्ञानिक प्रगतीकडे जगाचे लक्ष वेधले आहे. प्रकाश-संवेदनशील प्रथिनांच्या साहाय्याने चेतापेशींच्या क्रियांवर नियंत्रण मिळवता येते आणि त्यांच्या कार्याचा अधिक अचूक अभ्यास करता येतो, हे दाखवून देणाऱ्या संशोधनामुळे मेंदूविज्ञानाला नवी दिशा मिळाली आहे. प्रकाशाचा वापर केवळ निरीक्षणासाठी न करता, पेशींच्या कार्यात हस्तक्षेप करण्यासाठीही करता येऊ शकतो, ही या संशोधनाची महत्त्वाची देणगी आहे.

तीन वैज्ञानिकांचे उल्लेखनीय योगदान

२०२६ चा शरीरक्रियाशास्त्र किंवा वैद्यकशास्त्रातील नोबेल पुरस्कार कार्ल डाइसरॉथ (Karl Deisseroth), पीटर हेगेमन (Peter Hegemann) आणि जॉर्ज नागेल (Georg Nagel) यांना प्रकाश-संवेदनशील आयन वाहिन्या आणि ऑप्टोजेनेटिक्सच्या विकासाशी संबंधित संशोधनासाठी संयुक्तपणे प्रदान करण्यात आला. त्यांच्या कार्यामुळे मेंदूतील विशिष्ट चेतापेशींच्या क्रिया प्रकाशाच्या साहाय्याने नियंत्रित करून त्यांचा अभ्यास करण्याचा मार्ग खुला झाला.

१. कार्ल डाइसरॉथ — प्रकाशाद्वारे चेतापेशींच्या कार्याचा अभ्यास

अमेरिकेतील स्टॅनफर्ड विद्यापीठातील वैज्ञानिक कार्ल डाइसरॉथ यांनी ऑप्टोजेनेटिक्सच्या विकासात महत्त्वपूर्ण योगदान दिले. प्रकाशाला प्रतिसाद देणारी प्रथिने विशिष्ट चेतापेशींमध्ये कार्यरत करून त्यांच्या क्रिया नियंत्रित करण्याच्या तंत्राच्या विकासात त्यांच्या संशोधनाची महत्त्वाची भूमिका होती.

या तंत्रामुळे मेंदूतील विशिष्ट चेतापेशी सक्रिय केल्यावर किंवा त्यांची क्रिया रोखल्यावर शरीराच्या हालचाली, स्मरणशक्ती अथवा वर्तनात कोणते बदल घडतात, याचा अधिक अचूक अभ्यास करणे शक्य झाले. मेंदूतील एखाद्या विशिष्ट पेशीसमूहाची क्रिया आणि त्यातून दिसणारा परिणाम यांच्यातील संबंध तपासण्यासाठी हे तंत्र उपयुक्त ठरले.

२. पीटर हेगेमन — प्रकाशाला प्रतिसाद देणाऱ्या जैविक यंत्रणेचा शोध

जर्मनीतील हम्बोल्ट विद्यापीठाशी संबंधित वैज्ञानिक पीटर हेगेमन यांनी सूक्ष्मजीव प्रकाश कसा ओळखतात आणि त्यानुसार आपली जैविक क्रिया कशी बदलतात, याचा सखोल अभ्यास केला.

या संशोधनात क्लॅमिडोमोनास (Chlamydomonas) या एकपेशीय हिरव्या शैवालाला विशेष महत्त्व आहे. प्रकाशाला प्रतिसाद देणाऱ्या या जीवाच्या जैविक यंत्रणेचा अभ्यास करताना वैज्ञानिकांना प्रकाश-संवेदनशील प्रथिनांचे स्वरूप आणि कार्य समजून घेण्यास मदत झाली. पुढे याच ज्ञानाचा उपयोग चेतापेशींच्या क्रियांचा अभ्यास करण्यासाठी करता आला.

३. जॉर्ज नागेल — प्रकाश-संवेदनशील आयन वाहिन्यांचे महत्त्व

जर्मनीतील वुर्झबर्ग विद्यापीठाशी संबंधित वैज्ञानिक जॉर्ज नागेल यांनी चॅनेलरोडॉप्सिन (Channelrhodopsin) या प्रकाश-संवेदनशील प्रथिनांच्या अभ्यासात महत्त्वपूर्ण योगदान दिले.

ही प्रथिने विशिष्ट प्रकाशाच्या संपर्कात आल्यावर पेशींच्या पडद्यामधून विद्युतभारित आयनच्या हालचालींना परवानगी देतात. परिणामी, पेशींच्या विद्युत क्रियांमध्ये बदल घडू शकतो. या गुणधर्मामुळे प्रकाशाचा वापर करून चेतापेशींच्या क्रियांवर नियंत्रण मिळवण्याची वैज्ञानिक शक्यता प्रत्यक्षात आणता आली.

या तिन्ही वैज्ञानिकांच्या संशोधनातून मूलभूत जैविक शोध आणि त्यांचा मेंदूविज्ञानातील उपयोग यांच्यातील महत्त्वाचा दुवा स्पष्ट झाला.

ऑप्टोजेनेटिक्स म्हणजे नेमके काय?

ऑप्टोजेनेटिक्स हे आनुवंशिकशास्त्र आणि प्रकाशाधारित तंत्रज्ञान यांचा संगम असलेले संशोधनतंत्र आहे. या पद्धतीत प्रकाशाला प्रतिसाद देणारी विशिष्ट प्रथिने निवडक पेशींमध्ये कार्यरत केली जातात. त्यानंतर नियंत्रित प्रकाशाचा वापर करून त्या पेशींच्या क्रिया सुरू करणे किंवा कमी करणे शक्य होते.

सोप्या भाषेत सांगायचे, तर प्रकाशाच्या साहाय्याने मेंदूतील विशिष्ट चेतापेशींच्या क्रियांवर नियंत्रण ठेवून त्यांचा अभ्यास करणे म्हणजे ऑप्टोजेनेटिक्स.

उदाहरणार्थ, मेंदूतील एखाद्या विशिष्ट पेशीसमूहाला सक्रिय केल्यावर शरीराच्या हालचालींमध्ये बदल होतो का, एखाद्या स्मृतीशी संबंधित प्रक्रिया प्रभावित होते का किंवा विशिष्ट वर्तनामागे त्या पेशींची भूमिका आहे का, याचा अभ्यास करता येतो. अशा प्रयोगांमुळे मेंदूतील विविध पेशीसमूहांची कार्ये आणि त्यांच्यातील परस्परसंबंध समजून घेण्यास मदत होते.

एका सूक्ष्म शैवालापासून मेंदूच्या संशोधनापर्यंतचा प्रवास

या संशोधनातील सर्वांत लक्षणीय बाब म्हणजे त्याच्या मुळाशी असलेला एका सूक्ष्म हिरव्या शैवालाचा अभ्यास.

क्लॅमिडोमोनास हा एकपेशीय जीव प्रकाश ओळखू शकतो आणि त्यानुसार आपली हालचाल बदलू शकतो. या जीवाच्या प्रकाश-संवेदनशील यंत्रणेचा अभ्यास करताना वैज्ञानिकांना चॅनेलरोडॉप्सिनसारख्या प्रथिनांचे महत्त्व समजले.

पुढे या प्रथिनांचा उपयोग चेतापेशींमध्ये प्रकाशाच्या साहाय्याने विद्युत क्रिया निर्माण करण्यासाठी करण्यात आला. २००५ मध्ये प्रकाशित झालेल्या महत्त्वपूर्ण संशोधनातून चॅनेलरोडॉप्सिनचा वापर करून सस्तन प्राण्यांच्या चेतापेशींना प्रकाशाच्या साहाय्याने सक्रिय करता येते, हे दाखवून देण्यात आले. त्यानंतर या तंत्राचा विकास होत गेला आणि जिवंत मेंदूमधील विशिष्ट चेतापेशीसमूहांचा अभ्यास करण्यासाठी त्याचा उपयोग होऊ लागला.

या प्रवासातून विज्ञानातील एक महत्त्वाचा धडा समोर येतो. मूलभूत संशोधन करताना मिळालेल्या ज्ञानाचा भविष्यात कोणत्या क्षेत्रात उपयोग होईल, याचा अंदाज अनेकदा सुरुवातीला बांधता येत नाही. सूक्ष्म शैवालाच्या प्रकाशाला प्रतिसाद देण्याच्या क्षमतेचा अभ्यास मानवी मेंदूच्या कार्यपद्धतीचा शोध घेण्यासाठी उपयुक्त ठरेल, अशी शक्यता या संशोधनातून प्रत्यक्षात आली.

वैद्यकीय क्षेत्रासाठी या संशोधनाचे महत्त्व

१. मेंदूच्या आजारांचा अभ्यास

पार्किन्सन रोग, अपस्मार आणि अल्झायमर रोग यांसारख्या विकारांमध्ये मेंदूतील चेतापेशींच्या कार्यात होणारे बदल समजून घेणे महत्त्वाचे असते. ऑप्टोजेनेटिक्ससारख्या तंत्रांचा वापर करून संशोधक विशिष्ट चेतापेशीसमूह आणि त्यांच्या कार्यातील बदलांचा अभ्यास करू शकतात. यामुळे काही आजारांच्या जैविक यंत्रणांविषयी अधिक माहिती मिळू शकते.

२. स्मरणशक्ती आणि भावनांचे संशोधन

स्मृती तयार होणे, शिकण्याची प्रक्रिया आणि भावनिक प्रतिसाद यांमध्ये मेंदूतील विविध चेतापेशीसमूहांची भूमिका असते. विशिष्ट पेशीसमूहांच्या क्रियांवर नियंत्रित पद्धतीने परिणाम करून त्यांचा अभ्यास केल्यास या प्रक्रियांमागील कार्यपद्धती अधिक स्पष्ट होऊ शकते.

३. भविष्यातील उपचारपद्धतींच्या शक्यता

प्रकाश-संवेदनशील प्रथिनांचा वापर करून काही विशिष्ट आजारांवर उपचार करता येतील का, याचा वैज्ञानिक अभ्यास सुरू आहे. उदाहरणार्थ, काही संशोधनांमध्ये विशिष्ट प्रकारच्या दृष्टिदोषांमध्ये प्रकाशाधारित तंत्रांच्या साहाय्याने दृष्टीचे कार्य अंशतः पुनर्स्थापित करण्याच्या शक्यतांचा अभ्यास करण्यात आला आहे.

मात्र, येथे एक महत्त्वाची मर्यादा लक्षात घेणे आवश्यक आहे. ऑप्टोजेनेटिक्सचा वापर प्रामुख्याने संशोधनासाठी केला जातो. या तंत्रावर आधारित अनेक वैद्यकीय उपचार अद्याप प्रायोगिक टप्प्यात आहेत. त्यांची सुरक्षितता, परिणामकारकता आणि दीर्घकालीन उपयुक्तता सिद्ध करण्यासाठी पुढील संशोधन आवश्यक आहे. त्यामुळे या शोधामुळे सर्वच मेंदूविकारांवर त्वरित उपचार उपलब्ध होतील, असा निष्कर्ष काढणे योग्य ठरणार नाही.

विज्ञानातील आंतरशाखीय सहकार्याचा विजय

या संशोधनामध्ये आण्विक जीवशास्त्र, भौतिकशास्त्र, आनुवंशिकशास्त्र आणि मेंदूविज्ञान यांचा संगम दिसून येतो. एका क्षेत्रातील मूलभूत शोध दुसऱ्या क्षेत्रात किती व्यापक उपयोगाचा ठरू शकतो, याचे हे महत्त्वपूर्ण उदाहरण आहे.

प्रकाशाला प्रतिसाद देणाऱ्या प्रथिनांचा अभ्यास करणाऱ्या संशोधकांचे काम आणि मेंदूतील चेतापेशींच्या कार्याचा अभ्यास करणाऱ्या वैज्ञानिकांचे प्रयत्न यांचा परस्पर संबंध जोडला गेला. या सहकार्यामुळे मेंदूतील विशिष्ट पेशीसमूहांच्या क्रिया केवळ नोंदवण्यापलीकडे जाऊन त्यांचा नियंत्रित अभ्यास करणे शक्य झाले.

वैज्ञानिक संशोधनाचे महत्त्व केवळ तात्काळ उपचार शोधण्यात नसते. अनेकदा मूलभूत संशोधनातून निर्माण झालेले ज्ञान भविष्यातील मोठ्या वैद्यकीय प्रगतीचा पाया बनते. म्हणूनच अशा शोधांचे मूल्यमापन करताना त्यांच्या आजच्या उपयोगाबरोबरच त्यांनी भविष्यातील संशोधनासाठी निर्माण केलेल्या शक्यतांचाही विचार करावा लागतो.

निष्कर्ष : प्रकाशातून ज्ञानाकडे!

२०२६ च्या शरीरक्रियाशास्त्र किंवा वैद्यकशास्त्रातील नोबेल पुरस्काराने गौरविण्यात आलेले संशोधन मेंदूच्या कार्यपद्धतीचा अभ्यास करण्यासाठी उपलब्ध झालेल्या नव्या साधनांचे महत्त्व अधोरेखित करते. प्रकाश-संवेदनशील प्रथिनांचा वापर करून चेतापेशींच्या क्रियांवर नियंत्रण ठेवता येणे, ही आधुनिक मेंदूविज्ञानातील महत्त्वपूर्ण प्रगती आहे.

तथापि, मानवी मेंदूची सर्व रहस्ये अद्याप उलगडलेली नाहीत. चेतापेशींचे जाळे, त्यांच्यातील परस्परसंबंध आणि त्यातून निर्माण होणाऱ्या विचार, भावना व वर्तन यांचा अभ्यास अजूनही सुरू आहे. ऑप्टोजेनेटिक्समुळे या प्रश्नांचा अधिक अचूक शोध घेण्याची संधी उपलब्ध झाली आहे; मात्र, त्यातून विकसित होणाऱ्या उपचारपद्धतींच्या शक्यता आणि मर्यादा यांचे मूल्यमापन वैज्ञानिक पुराव्यांच्या आधारेच करावे लागेल.

एका सूक्ष्म जीवाच्या प्रकाशाला प्रतिसाद देण्याच्या क्षमतेचा अभ्यास करताना सुरू झालेला प्रवास आज मानवी मेंदूच्या गुंतागुंतीच्या कार्यपद्धतीचा शोध घेण्यास मदत करत आहे. विज्ञानाची खरी ताकद याच जिज्ञासेत आहे. निसर्गातील एखाद्या छोट्याशा रहस्याचा शोध घेताना मानवजातीच्या भविष्यासाठी ज्ञानाची नवी क्षितिजे खुली होऊ शकतात.

- रानमोती / Ranmoti 
(लेखिका ह्या कृषी रसायनशास्त्रातील पदव्युत्तर पदवीधर, कृषी तज्ज्ञ आणि संशोधक आहेत.)

रसायनशास्त्रातील नोबेल पुरस्कार २०२६ : रेणूंच्या आरशातील रहस्याचा उलगडा

(विज्ञानातील एका महत्त्वपूर्ण संशोधनाची सोप्या भाषेत ओळख...)

विज्ञानाच्या जगात काही शोध असे असतात, जे आपल्याला निसर्गाकडे पाहण्याची नवी दृष्टी देतात. रसायनशास्त्रातील २०२६ चा नोबेल पुरस्कार हा अशाच एका महत्त्वपूर्ण संशोधनाशी संबंधित आहे. फ्रान्सचे रसायनशास्त्रज्ञ हेन्री बी. कागन (Henri B. Kagan) आणि जपानचे रसायनशास्त्रज्ञ केन्सो सोई (Kenso Soai) यांच्या संशोधनाचा संबंध रेणूंच्या आरशातील प्रतिमांसारख्या दोन रचनांशी आणि रासायनिक अभिक्रियांमध्ये त्यांपैकी एका रचनेची निर्मिती अधिक प्रमाणात कशी घडवून आणता येते, याच्याशी आहे.

या संशोधनाचा विषय समजून घेण्यासाठी आपल्याला रेणूंच्या सूक्ष्म जगात डोकावावे लागेल. कारण आपल्या हातांप्रमाणेच काही रेणूंच्याही दोन रचना एकमेकांच्या आरशातील प्रतिमांसारख्या असतात. या रचनांमधील सूक्ष्म फरक अनेक रासायनिक आणि जैविक प्रक्रियांमध्ये महत्त्वाची भूमिका बजावू शकतो.

रेणूंच्या जगातील आरशाचे रहस्य

आपण आपल्या दोन्ही हातांकडे पाहिले, तर ते एकमेकांच्या आरशातील प्रतिमांसारखे दिसतात. मात्र, डावा हात आणि उजवा हात एकमेकांवर पूर्णपणे जुळवून ठेवता येत नाहीत. रसायनशास्त्रातही काही रेणूंच्या बाबतीत असेच घडते.

अशा रेणूंच्या दोन रचना एकमेकांच्या आरशातील प्रतिमांसारख्या असतात. या गुणधर्माला चिरॅलिटी (Chirality) असे म्हणतात.

आकृती १ : रेणूंच्या आरशातील प्रतिमांची संकल्पना समजून घेण्यासाठी हातांचे उदाहरण.

या दोन रचना दिसायला सारख्या वाटल्या, तरी सजीवांच्या शरीरात त्या वेगवेगळ्या प्रकारे कार्य करू शकतात. उदाहरणार्थ, प्रथिनांची निर्मिती करणाऱ्या अमिनो आम्लांमध्ये विशिष्ट प्रकारच्या रचनेचे प्राबल्य आढळते. सजीवांमध्ये एका विशिष्ट प्रकारच्या रेणूंचे प्राबल्य का दिसते आणि त्यामागे कोणत्या रासायनिक प्रक्रिया कार्यरत असतात, हा वैज्ञानिकांसाठी दीर्घकाळ अभ्यासाचा विषय राहिला आहे.

हेन्री कागन यांचे महत्त्वपूर्ण योगदान

हेन्री कागन यांनी असममित सेंद्रिय संश्लेषणाच्या क्षेत्रातील संशोधनातून रासायनिक अभिक्रियांमध्ये एका विशिष्ट प्रकारच्या रेणूची निर्मिती अधिक प्रमाणात कशी साधता येऊ शकते, हे समजून घेण्यास महत्त्वपूर्ण मदत केली.

सोप्या भाषेत सांगायचे, तर एखाद्या रासायनिक अभिक्रियेत दोन प्रकारच्या रेणूंची निर्मिती होण्याची शक्यता असताना, त्यांपैकी एका प्रकारच्या रेणूचे प्रमाण अधिक कसे वाढवता येईल, हा या संशोधनामागील महत्त्वाचा प्रश्न आहे. अभिक्रियेत एका प्रकारच्या रेणूला सुरुवातीला मिळालेली थोडीशी आघाडी योग्य परिस्थितीत आणखी वाढू शकते. यामुळे रेणूंच्या निर्मितीवर अधिक अचूक नियंत्रण मिळवण्याच्या दृष्टीने वैज्ञानिकांना महत्त्वपूर्ण दिशा मिळाली.

केन्सो सोई आणि स्वयंउत्प्रेरणाचा शोध

केन्सो सोई यांनी स्वयंउत्प्रेरणाच्या (Autocatalysis) अभ्यासात महत्त्वपूर्ण योगदान दिले.

सोप्या भाषेत सांगायचे, तर काही रासायनिक अभिक्रियांमध्ये तयार झालेला पदार्थ पुढील अभिक्रिया घडण्यास स्वतःच मदत करू शकतो. म्हणजेच, अभिक्रियेत तयार झालेला पदार्थच त्याच प्रकारचा आणखी पदार्थ तयार होण्याच्या प्रक्रियेला चालना देतो.

योग्य परिस्थितीत ही प्रक्रिया वारंवार घडल्यास एका विशिष्ट प्रकारच्या रेणूचे प्रमाण वाढू शकते. त्यामुळे रासायनिक अभिक्रियांमध्ये एखाद्या विशिष्ट रचनेचे प्राबल्य कसे निर्माण होऊ शकते, हे समजून घेण्यासाठी स्वयंउत्प्रेरणाचा अभ्यास महत्त्वाचा ठरतो. सोई यांच्या संशोधनामुळे या प्रक्रियेचे महत्त्व स्पष्ट होण्यास मदत झाली.

आकृती २ : स्वयंउत्प्रेरण कसे कार्य करते?
  • सुरुवात : रासायनिक अभिक्रिया सुरू होते.
  • मदत : तयार झालेला पदार्थ पुढील अभिक्रियेला मदत करतो.
  • वाढ : योग्य परिस्थितीत त्याच प्रकारचा अधिक पदार्थ तयार होऊ शकतो.

ही आकृती स्वयंउत्प्रेरणाची संकल्पना सोप्या पद्धतीने समजावते. प्रत्यक्षात, रासायनिक अभिक्रियेचे स्वरूप आणि त्यावर परिणाम करणारे घटक यांनुसार ही प्रक्रिया अधिक गुंतागुंतीची असू शकते.

या संशोधनाचे महत्त्व काय?

या संशोधनाचे महत्त्व केवळ रसायनशास्त्रापुरते मर्यादित नाही. औषधनिर्मिती, जैविक प्रक्रिया आणि रेणूंच्या गुणधर्मांचा अभ्यास अशा अनेक क्षेत्रांमध्ये त्याचा उपयोग होऊ शकतो.

१. औषधनिर्मिती : अनेक औषधी रेणूंच्या आरशातील दोन रचनांचा शरीरावर वेगवेगळा परिणाम होऊ शकतो. त्यामुळे औषधनिर्मिती करताना अपेक्षित रचनेचा रेणू अधिक प्रमाणात तयार करणे महत्त्वाचे ठरते.

२. रासायनिक प्रक्रियांवर नियंत्रण : रासायनिक अभिक्रियांमधून कोणत्या प्रकारचे रेणू तयार होतील, यावर अधिक चांगले नियंत्रण मिळवण्यासाठी अशा संशोधनाचा उपयोग होतो. त्यामुळे विशिष्ट गुणधर्म असलेले पदार्थ तयार करण्याच्या प्रक्रियांना अधिक दिशा मिळू शकते.

३. जीवनाच्या उत्पत्तीचा अभ्यास : सजीवांमध्ये रेणूंच्या विशिष्ट रचनांचे प्राबल्य कसे निर्माण झाले असावे, हा विज्ञानातील महत्त्वाचा प्रश्न आहे. या प्रक्रियांचा अभ्यास केल्यामुळे जीवनाच्या रासायनिक उत्पत्तीविषयीच्या संशोधनाला नवी दिशा मिळू शकते.

४. भविष्यातील संशोधन : रेणूंची रचना, त्यांचे गुणधर्म आणि त्यांच्या निर्मितीच्या प्रक्रिया यांचा अधिक सखोल अभ्यास करण्यासाठी हे संशोधन महत्त्वाचा वैज्ञानिक आधार ठरते.

विद्यार्थ्यांसाठी सोपा निष्कर्ष

रेणूंच्या रचनेतील अगदी लहानसा फरकदेखील महत्त्वपूर्ण ठरू शकतो, ही या संशोधनातून समोर येणारी मुख्य बाब आहे. योग्य रासायनिक परिस्थितीत एका विशिष्ट प्रकारच्या रेणूची निर्मिती अधिक प्रमाणात कशी घडवून आणता येते, हे समजून घेणे औषधनिर्मितीपासून सजीवांमधील रासायनिक प्रक्रियांच्या अभ्यासापर्यंत अनेक क्षेत्रांसाठी उपयुक्त आहे.

रेणूंच्या आरशातील प्रतिमांचे रहस्य समजून घेण्याचा हा वैज्ञानिक प्रवास आपल्याला निसर्गातील सूक्ष्म गोष्टींकडे अधिक बारकाईने पाहण्यास शिकवतो. कारण विज्ञानात अनेकदा अगदी लहान वाटणाऱ्या फरकांमधूनच मोठ्या शोधांची सुरुवात होते. रेणूंच्या रचनेमागील रहस्यांचा शोध घेणे म्हणजे केवळ रसायनशास्त्र समजून घेणे नव्हे, तर सजीवसृष्टीच्या कार्यपद्धतीविषयी अधिक जाणून घेण्याच्या दिशेने टाकलेले एक महत्त्वाचे पाऊल आहे.

- रानमोती / Ranmoti 
(लेखिका ह्या कृषी रसायनशास्त्रातील पदव्युत्तर पदवीधर, कृषी तज्ज्ञ आणि संशोधक आहेत.)

Thursday, October 8, 2026

वह सच्चा प्रशंसक था… दोनों हाथों में घड़ियाँ, गले में पेन का साज और मन में एक अधूरी आस..

वह सच्चा प्रशंसक था…

दोनों हाथों में घड़ियाँ, गले में पेन का साज और मन में एक अधूरी आस..


आज सुबह नाना पाटेकर जी के निधन की खबर सुनी तो कुछ देर तक मन जैसे ठहर-सा गया।

कुछ कलाकार ऐसे होते हैं, जिन्हें हम केवल पर्दे पर देखते हैं। उनके अभिनय की तारीफ करते हैं, उनकी फिल्में देखते हैं और फिर अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में लौट जाते हैं।

लेकिन कुछ कलाकार ऐसे होते हैं, जो धीरे-धीरे हमारी स्मृतियों का हिस्सा बन जाते हैं। उनकी आवाज़, उनका चेहरा, उनका कोई संवाद या उनका निभाया हुआ कोई किरदार—कहीं न कहीं हमारे भीतर रह जाता है।

नाना पाटेकर उन्हीं कलाकारों में से एक थे।

उनके अभिनय में बनावट नहीं थी। संवाद बोलते हुए ऐसा लगता था जैसे शब्द लिखे हुए नहीं, बल्कि भीतर से निकल रहे हों। उनकी आवाज़ में एक ऐसी सच्चाई थी, जो सीधे दिल तक पहुँचती थी।

और आज उनके जाने की खबर ने मुझे लगभग दस-पंद्रह दिन पहले की एक छोटी-सी मुलाकात फिर से याद दिला दी।

एक ऐसी मुलाकात, जिसे उस समय शायद हमने सामान्य-सी घटना समझा था।

लेकिन आज लगता है, वह मुलाकात अपने भीतर एक पूरी कहानी समेटे हुए थी।


हम मध्य प्रदेश के महेश्वर, जिला खरगोन गए थे।

नर्मदा के किनारे बसा महेश्वर—इतिहास, आस्था और शांत बहती नदी के बीच खड़ा एक सुंदर शहर। देवी अहिल्याबाई होलकर की स्मृतियों से जुड़ी इस नगरी में हम देवी अहिल्याबाई होलकर के महल के पास स्थित बांके बिहारी भोजनालय में भोजन करने गए थे।

हम खाना खाने बैठे ही थे कि एक बुज़ुर्ग व्यक्ति हमारे पास आकर खड़े हो गए।

उम्र लगभग अस्सी-बयासी वर्ष रही होगी।

शरीर बहुत दुबला-पतला था। चेहरे पर उम्र की गहरी रेखाएँ थीं। लेकिन आँखों में एक अजीब-सी चमक थी—जैसे जिंदगी ने उन्हें बहुत कुछ दिखाया हो, मगर उनकी जिज्ञासा अभी भी खत्म न हुई हो।

और सबसे पहली चीज़ जिसने मेरा ध्यान खींचा, वह थीं उनकी घड़ियाँ।

उनके दोनों हाथों में कई घड़ियाँ थीं।

कुछ पुरानी, कुछ नई।

मैं खुद को रोक नहीं पाई और पूछ बैठी—

“आपने इतनी सारी घड़ियाँ क्यों पहन रखी हैं?”

उन्होंने मेरी ओर देखा और बहुत सहजता से कहा—

“जीवन एक संघर्ष है… और ये घड़ियाँ समय का प्रतीक हैं। पुराना समय और नया समय… दोनों को साथ लेकर चल रहा हूँ।”

मैं कुछ क्षण चुप रह गई।

कितना साधारण-सा उत्तर था।

लेकिन उस उम्र के एक व्यक्ति के मुँह से निकला वही साधारण वाक्य अचानक बहुत गहरा लगने लगा।

पुराना समय और नया समय… दोनों को साथ लेकर चलना।

शायद यही तो जीवन है।

लेकिन उनकी कहानी में अभी और भी बहुत कुछ था।

उनके पास दस-पंद्रह अलग-अलग पेन भी थे।

मेरे बेटे ने उन्हें देखा तो उससे भी रहा नहीं गया। उसने पूछ लिया—

“दादाजी, आपके पास इतने सारे पेन क्यों हैं?”

बुज़ुर्ग ने मुस्कुराकर उसकी ओर देखा और कहा—

“अगर कोई स्कूल का बच्चा या कोई भी बच्चा मुझसे कहता है—‘दादाजी, कुछ दे दो’… तो मैं इनमें से एक पेन निकालकर उसे दे देता हूँ।”

उनका जवाब सुनकर हम कुछ क्षण उन्हें देखते ही रह गए।

किसी बच्चे के हाथ में चॉकलेट रख देना आसान है।

कोई टॉफी दे देना भी आसान है।

लेकिन किसी बच्चे के हाथ में पेन देना और उसके पीछे एक सोच रखना—यह बात अलग थी।

उनका मानना था कि अगर कोई बच्चा उनसे कुछ माँगता है, तो उसे ऐसी चीज़ दी जाए जो उसे पढ़ाई की ओर ले जाए।

एक पेन—शायद छोटी-सी चीज़ थी, लेकिन उनके लिए वह शिक्षा का संदेश था।

वे अपनी तरह से बच्चों को पढ़ाई के लिए प्रेरित करना चाहते थे। उन्हें यह एहसास दिलाना चाहते थे कि हाथ में पकड़ा हुआ पेन केवल लिखने की वस्तु नहीं, बल्कि आगे बढ़ने का एक साधन भी हो सकता है।

उस उम्र में भी उनके भीतर बच्चों की पढ़ाई को लेकर इतनी चिंता थी।

मुझे लगा, कुछ लोग उम्र के साथ बूढ़े होते हैं…

और कुछ लोग उम्र के साथ और गहरे होते जाते हैं।

भोलेजी शायद उन्हीं लोगों में से थे।

बातचीत आगे बढ़ी तो पता चला कि उनका नाम भोले था।

वे मूल रूप से मध्य प्रदेश के रहने वाले नहीं थे। महाराष्ट्र के एक ब्राह्मण परिवार से उनका संबंध था। वे कभी मुंबई में भी रहे थे, लेकिन वहाँ टिक नहीं सके और बाद में मध्य प्रदेश लौट आए।

वे मुझसे हिंदी में बातें कर रहे थे।

बातों-बातों में उन्होंने अचानक कहा—

“तुम बिल्कुल मेरी भतीजी जैसी दिखती हो।”

उनकी आँखों में उस समय जो अपनापन था, वह औपचारिक नहीं था।

शायद मुझे देखकर उन्हें सचमुच अपनी भतीजी याद आ गई थी।

मेरे पति भी मेरे साथ थे। भोलेजी उनसे भी बड़ी आत्मीयता से बातें करने लगे।

फिर अचानक बातचीत के बीच उन्होंने एक बात कही—

“मुझे मुंबई जाना है।”

मेरे पति ने पूछा—

“मुंबई क्यों जाना है?”

उन्होंने बिना किसी झिझक के कहा—

“मुझे नाना पाटेकर से मिलना है।”

बस।

इतना-सा वाक्य।

लेकिन उस एक वाक्य ने जैसे पूरी बातचीत का रुख बदल दिया।

मैंने उनकी ओर देखा।

अस्सी-बयासी साल का एक बुज़ुर्ग।

दुबला-पतला शरीर।

दोनों हाथों में घड़ियाँ।

गले में पेन।

जिंदगी की न जाने कितनी मुश्किलों और उतार-चढ़ावों से गुजर चुका इंसान।

लेकिन उसके भीतर अभी भी एक इच्छा उतनी ही जीवित थी, जितनी शायद किसी युवा प्रशंसक के मन में होती है।

नाना पाटेकर से एक बार मिलना।

मेरे पति ने उनसे पूछा—

“नाना पाटेकर से ही क्यों मिलना है?”

यह सवाल सुनते ही उनके चेहरे पर एक अलग चमक आ गई।

उन्होंने कहा—

“नाना पाटेकर जैसा कलाकार मैंने कभी नहीं देखा। मैं उनका बहुत बड़ा प्रशंसक हूँ। उनका अभिनय… उनकी आवाज़… उनका संवाद बोलने का तरीका… सब कुछ दिल को छू जाता है। वो जो बोलते हैं, वो सिर्फ बोलते नहीं—महसूस करवाते हैं।”

उस समय उनके चेहरे को देखना अपने आप में एक अनुभव था।

वह किसी प्रसिद्ध अभिनेता का नाम लेते हुए केवल उत्साहित नहीं थे।

वह जैसे अपने किसी प्रिय व्यक्ति के बारे में बात कर रहे थे।

और तभी मेरे मन में एक सवाल आया—

आखिर सच्चा प्रशंसक होता कौन है?

क्या वह, जो किसी कलाकार की फिल्म देखता है?

क्या वह, जो उसकी तस्वीर लगाता है?

क्या वह, जो सोशल मीडिया पर उसके निधन के बाद श्रद्धांजलि लिखता है?

या वह, जिसके जीवन के अंतिम पड़ाव में भी उस कलाकार से मिलने की इच्छा बची रहती है?

शायद…

वही सच्चा प्रशंसक होता है।

मेरे पति ने भोलेजी से कहा—

“आप जब भी मुंबई आएँ, हमें जरूर बताइएगा। हम अपनी तरफ से पूरी कोशिश करेंगे कि आपकी नाना पाटेकर से मुलाकात हो सके।”

हम जानते थे कि हम कोई निश्चित वादा नहीं कर सकते।

किसी कलाकार से मुलाकात हो जाएगी, इसकी गारंटी देना हमारे हाथ में नहीं था।

लेकिन उनकी इच्छा को हल्के में लेना भी हमें ठीक नहीं लगा।

इसलिए हमने बस इतना कहा कि—

अगर भोलेजी मुंबई आएँगे, तो हम अपनी तरफ से पूरी कोशिश जरूर करेंगे।

उस समय हमें क्या पता था कि कुछ ही दिनों बाद हालात इतने बदल जाएंगे।

आज नाना पाटेकर हमारे बीच नहीं हैं।

और आज जब उनके जाने का दुख पूरे देश में है, तब महेश्वर के उस बांके बिहारी भोजनालय में हुई वह मुलाकात बार-बार आँखों के सामने आ रही है।

मन में एक सवाल उठता है—

भोलेजी को यह खबर मिली होगी तो उनके मन पर क्या गुज़री होगी?

जिस व्यक्ति से मिलने की इच्छा उन्होंने इतने विश्वास से अपने मन में सँजो रखी थी…

जिसके लिए उन्होंने कहा था—

“मुझे नाना पाटेकर से मिलना है…”

वह इच्छा शायद अब अधूरी ही रह गई।

शायद वह मुलाकात कभी नहीं हो पाएगी।

और यही सोचकर मन में एक अजीब-सी उदासी उतर आती है।

लेकिन उस मुलाकात ने मुझे नाना पाटेकर की लोकप्रियता का एक ऐसा रूप दिखाया, जो शायद किसी पुरस्कार, सम्मान या बॉक्स ऑफिस के आँकड़े से कहीं बड़ा है।

किसी कलाकार का किसी अनजान इंसान के मन में अपने लिए मिलने की ऐसी तड़प पैदा कर देना—यही तो कला की असली ताकत है।

नाना पाटेकर केवल किरदार निभाते नहीं थे।

वे उन्हें जीते थे।

उनकी आवाज़ में शब्द होते थे, लेकिन उन शब्दों के पीछे भावनाएँ होती थीं।

उनके अभिनय में दिखावा नहीं था।

एक कच्चापन था।

एक सच्चाई थी।

और शायद इसी कारण वे पर्दे से निकलकर लोगों के जीवन का हिस्सा बन गए।

आज एक बड़ा कलाकार चला गया।

एक बड़ी आवाज़ शांत हो गई।

एक असाधारण अभिनय यात्रा थम गई।

लेकिन कलाकार की जिंदगी केवल उसके जाने तक नहीं होती।

वह उसके बाद भी चलती रहती है—

उसके किरदारों में,

उसके संवादों में,

उसकी आवाज़ में,

और उन लोगों की यादों में, जिनके दिल में उसने कभी जगह बनाई थी।

मेरे लिए नाना पाटेकर की आज की सबसे बड़ी याद कोई पुरस्कार नहीं है।

कोई प्रसिद्ध संवाद भी नहीं।

मेरी आँखों के सामने तो बस महेश्वर के उस बांके बिहारी भोजनालय में मिले भोलेजी हैं।

एक दुबला-पतला, वृद्ध व्यक्ति…

दोनों हाथों में तरह-तरह की घड़ियाँ…

गले में दस-पंद्रह पेन…

किसी बच्चे के “दादाजी, कुछ दे दो” कहने पर अपनी पेन में से एक पेन निकालकर उसके हाथ में रख देने वाला…

चॉकलेट के बजाय पेन देकर बच्चों को पढ़ाई और शिक्षा की ओर प्रेरित करने वाला…

और अपने मन में एक ऐसी इच्छा सँजोए हुए, जो शायद अब कभी पूरी नहीं होगी—

“मुझे नाना पाटेकर से मिलना है।”

आज उस अनजान प्रशंसक की याद आ रही है।

और उसके साथ याद आ रहे हैं नाना पाटेकर।

शायद यही किसी कलाकार की सबसे बड़ी उपलब्धि है—

कि उसके जाने के बाद भी कोई दूर किसी छोटे-से शहर में बैठा व्यक्ति उसे याद करे और कहे—

“मैं उनसे एक बार मिलना चाहता था…”

नाना पाटेकर को भावपूर्ण श्रद्धांजलि। 🙏

नाना, आप चले गए…
लेकिन आपकी कला, आपकी आवाज़ और आपके अभिनय की वह सच्चाई
असंख्य दिलों में हमेशा जीवित रहेगी।

- रानमोती / Ranmoti

तो खरा चाहता होता… दोन्ही हातांत घड्याळं, गळ्यात पेनांचा साज आणि मनात एक अधुरी आस?

तो खरा चाहता होता…
दोन्ही हातांत घड्याळं, गळ्यात पेनांचा साज आणि मनात एक अधुरी आस?
आज सकाळी नाना पाटेकर यांच्याबद्दलची दुःखद बातमी ऐकली… आणि मन सुन्न झालं.

नाना पाटेकर—केवळ मराठी मातीचा दिग्गज कलाकार नव्हे, तर संपूर्ण भारतीय चित्रपटसृष्टीने अभिमानाने जपावा असा एक असामान्य कलाकार. त्यांच्या अभिनयातली तीव्रता, संवादफेक, संवेदनशीलता आणि पडद्यावरचा विलक्षण प्रामाणिकपणा याला तोड नाही.

आज त्यांच्या निधनाची बातमी ऐकताना मला माझ्या आयुष्यातला एक छोटासा, पण मनावर कायमचा कोरला गेलेला प्रसंग आठवला.

ही गोष्ट अगदी दहा-पंधरा दिवसांपूर्वीची.

आम्ही मध्य प्रदेशातील महेश्वर, जिल्हा खरगोन येथे गेलो होतो. नर्मदेच्या काठावर वसलेलं हे ऐतिहासिक शहर देवी अहिल्याबाई होळकर यांच्या स्मृतींशी जोडलेलं आहे. आम्ही देवी अहिल्याबाई होळकर यांच्या पॅलेसच्या बाजूला असलेल्या ‘बांके बिहारी भोजनालयात’ भोजनासाठी गेलो होतो.

आम्ही जेवायला बसलो असताना अचानक एक वयोवृद्ध गृहस्थ माझ्याजवळ आले.

त्यांचं नाव भोले.

वय साधारण ऐंशी-ब्याऐंशीच्या आसपास असावं. अंगाने अतिशय कृश. पण त्यांच्या व्यक्तिमत्त्वात एक विलक्षण आकर्षण होतं.

त्यांच्या दोन्ही हातांमध्ये अनेक घड्याळं होती!

एका हातात जुनी घड्याळं आणि दुसऱ्या हातात नवीन घड्याळं.

मला कुतूहल वाटलं. मी त्यांना विचारलं,

“तुम्ही एवढी सगळी घड्याळं का घातली आहेत?”

त्यांनी दिलेलं उत्तर आजही माझ्या मनात तसंच आहे—

“जीवन हा एक संघर्ष आहे… आणि ही घड्याळं म्हणजे वेळेचं प्रतीक आहेत. जुनी वेळ आणि नवी वेळ… दोन्ही सोबत घेऊन चालतोय.”

किती साधं उत्तर… पण किती मोठा अर्थ!

पण एवढंच नव्हतं.

त्यांच्याकडे दहा-पंधरा वेगवेगळे पेनही होते.

माझ्या मुलाने त्यांना उत्सुकतेने विचारलं,

“दादाजी, तुमच्याकडे एवढे सगळे पेन का आहेत?”

त्यांचं उत्तर ऐकून आम्ही अक्षरशः थक्क झालो.

ते म्हणाले,

“अगर कोई स्कूल का बच्चा या कोई भी बच्चा मुझसे कहता है—‘दादाजी, कुछ दे दो’… तो मैं इनमें से एक पेन निकालकर उसे दे देता हूँ.”

म्हणजे एखाद्या मुलाने काही मागितलं, तर त्याला चॉकलेट किंवा खाऊ देण्याऐवजी ते त्याच्या हातात एक पेन देत होते—शिकण्याची आणि शिक्षणाची छोटीशी भेट.

त्यांच्या या कृतीमागे एक सुंदर विचार होता—मुलांना शिक्षणाची जाणीव करून देणं, त्यांना अभ्यासासाठी प्रोत्साहित करणं आणि आपल्या परीने शिक्षणाचा संदेश प्रत्येक मुलापर्यंत पोहोचवणं.

स्वतःकडे असलेली वस्तू साठवून ठेवण्यापेक्षा एखाद्या मुलाच्या हातात पेन देऊन त्याच्या शिक्षणाला प्रोत्साहन देणं—हीच तर खरी श्रीमंती.

नंतर त्यांच्याशी बोलताना कळलं की ते मूळचे मध्य प्रदेशचे नव्हते. ते महाराष्ट्रातील ब्राह्मण कुटुंबातून आलेले होते. पूर्वी मुंबईतही राहिले होते. पण मुंबईत टिकता आलं नाही, म्हणून पुन्हा मध्य प्रदेशात परतले.

ते माझ्याशी हिंदीत बोलत होते. बोलता बोलता अचानक म्हणाले,

“तुम बिल्कुल मेरी भतीजी जैसी दिखती हो.”

मला पाहताच त्यांना त्यांच्या भाचीची आठवण झाली होती.

त्यांच्या डोळ्यांतला तो भाव पाहून मीही त्यांच्या भावनांचा आदर केला. माझे पतीही माझ्यासोबत होते. त्यांच्याशीही भोलेजींनी मनमोकळेपणाने संवाद साधला.

आणि मग त्यांनी एक इच्छा व्यक्त केली.

अगदी साधी… पण आज विचार केला तर विलक्षण मोठी वाटणारी.

ते म्हणाले,

“मुझे मुंबई जाना है.”

माझ्या पतींनी हसत विचारलं,

“मुंबई क्यों जाना है?”

त्यांचं उत्तर होतं—

“मुझे नाना पाटेकर से मिलना है.”

क्षणभर आम्ही दोघेही शांत झालो.

मी त्या माणसाकडे पाहिलं.

वयाच्या या टप्प्यावर, आयुष्याच्या कितीतरी चढ-उतारांतून गेलेला तो माणूस… शरीराने थकलेला… अंगाने कृश… साध्या वेशात…

पण मनात अजूनही एक इच्छा जिवंत होती.

नाना पाटेकरांना एकदा भेटायचं!

माझ्या पतींनी त्यांना विचारलं,

“नाना पाटेकरांनाच का भेटायचं आहे?”

तेव्हा त्यांच्या चेहऱ्यावर एक वेगळंच तेज आलं.

ते म्हणाले,

“नाना पाटेकर जैसा कलाकार मैंने कभी नहीं देखा. मैं उनका बहुत बड़ा फैन हूँ. उनका अभिनय… उनकी आवाज… उनका संवाद बोलने का तरीका… सब कुछ दिल को छू जाता है. वो जो बोलते हैं, वो सिर्फ बोलते नहीं—महसूस करवाते हैं.”

त्या क्षणी मला जाणवलं—

खरा चाहता कोण असतो?

एखादा कलाकार गेल्यानंतर सोशल मीडियावर दुःख व्यक्त करणारे हजारो लोक असतात.

पण एखाद्या कलाकाराला भेटण्याची इच्छा जर एखाद्या अशा वृद्ध माणसाच्या मनात शेवटपर्यंत जिवंत असेल, ज्याला आयुष्याच्या या टप्प्यावर दुसरं काही नको आहे…

तर तो चाहता असतो.

तो खरा चाहता असतो.

माझ्या पतींनीही भोलेजींना तेव्हा आश्वासन दिलं,

“तुम्ही जेव्हा कधी मुंबईला या, आम्हाला नक्की कळवा. आम्ही आमच्या परीने प्रयत्न करू, तुम्हाला नाना पाटेकरांना भेटवता येतंय का ते पाहू.”

ते आश्वासन नक्कीच होतं—पण त्यात कोणताही खोटा दावा नव्हता. नाना पाटेकरांची भेट होईल याची खात्री आम्ही देऊ शकत नव्हतो; मात्र भोलेजींची इच्छा पूर्ण करण्यासाठी शक्य तेवढा प्रयत्न करू, एवढं मात्र मनापासून सांगितलं होतं.

आज नाना पाटेकर आपल्यात नाहीत.

आणि आज त्यांच्यासाठी संपूर्ण देश शोक व्यक्त करत असताना मला महेश्वरच्या त्या बांके बिहारी भोजनालयात भेटलेले भोलेजी पुन्हा पुन्हा आठवत आहेत.

मनात एक विचार येतो—

कदाचित त्यांची ती इच्छा आता अपूर्णच राहिली असेल…

कदाचित नाना पाटेकरांना भेटण्याचं त्यांचं स्वप्न पूर्ण होणार नाही.

पण भोलेजींनी मला नाना पाटेकरांच्या लोकप्रियतेचा एक असा पैलू दाखवला, जो कदाचित कोणत्याही पुरस्कारापेक्षा मोठा आहे.

एका कलाकाराने एका अनोळखी माणसाच्या मनात निर्माण केलेली भेटण्याची आस.

हीच तर कलेची खरी ताकद आहे.

नाना पाटेकर पडद्यावर भूमिका साकारत नव्हते; ते भूमिका जगत होते. त्यांच्या आवाजात शब्द असायचे, पण त्या शब्दांच्या मागे भावना असायच्या. त्यांच्या अभिनयात दिखावा नव्हता; एक कच्चा, अस्सल आणि मनाला भिडणारा प्रामाणिकपणा होता.

म्हणूनच ते फक्त कलाकार राहिले नाहीत…

ते लोकांच्या मनाचा एक भाग झाले.

आज त्यांच्या जाण्याने एक मोठा कलाकार हरपला आहे.

एक मोठा आवाज शांत झाला आहे.

एक असामान्य अभिनयप्रवास थांबला आहे.

पण त्यांनी निर्माण केलेली पात्रं, संवाद, भावना आणि असंख्य चाहत्यांच्या मनात त्यांनी निर्माण केलेली जागा—ती कधीच संपणार नाही.

आणि माझ्यासाठी नाना पाटेकरांची आजची सर्वात मोठी आठवण म्हणजे कोणताही पुरस्कार नाही, कोणताही प्रसिद्ध संवाद नाही…

तर महेश्वरमधील त्या बांके बिहारी भोजनालयात भेटलेले भोलेजी…

एक कृश, वयोवृद्ध गृहस्थ…

दोन्ही हातांत जुन्या-नव्या घड्याळांचा भार घेऊन उभा असलेला…

जवळ दहा-पंधरा पेन जपून ठेवणारा…

एखादं मूल “दादाजी, कुछ दे दो” म्हणालं की त्यातील एक पेन त्याला देणारा…

चॉकलेट देण्यापेक्षा मुलाच्या हातात पेन देऊन त्याला शिक्षणाची आणि अभ्यासाची गोडी लागावी, हा विचार मनात ठेवणारा…

आणि मनात एकच इच्छा जपणारा—

“मुझे नाना पाटेकर से मिलना है.”

आज त्या अनोळखी चाहत्याची आठवण येतेय…

आणि नाना पाटेकरांना मनापासून श्रद्धांजली.

नाना, तुम्ही गेलात…
पण तुमची कला, तुमचा आवाज आणि तुमच्या अभिनयाची प्रामाणिकता
असंख्य मनांमध्ये कायम जिवंत राहील.

भावपूर्ण श्रद्धांजली. 🙏

- रानमोती / Ranmoti

Thursday, September 3, 2026

यशोदायाः प्रेमब्रह्माण्डम्


यशोदायाः प्रेमब्रह्माण्डम्

नन्दस्य गेहे या माता, वात्सल्यामृतवर्षिणी।
यस्याः प्रेम्णा जगत्सर्वं, कृष्णे लीनमिवाभवत्॥

मृत्तिकां भक्षितं दृष्ट्वा, कृष्णं सा पर्यपृच्छत।
मुखं विवर्तितं तस्य, तत्र लोकान् ददर्श सा॥

न केवलं मृदाकणं, न केवलं बाललीलिका।
तत्र सा ददृशे विश्वं, सूर्यचन्द्रादिसंयुतम्॥

गिरयः सरितश्चैव, नभः पृथ्वी च सागराः।
चराचरं जगत्सर्वं, कृष्णस्यास्ये व्यवस्थितम्॥

न कृष्णमुखमात्रे तद्, विश्वरूपं प्रकाशते।
यशोदायाः शुद्धप्रेम, विश्वरूपं व्यजायत॥

यत्र प्रेम निर्मलं स्यात्, तत्र दृष्टिः दिव्यतां व्रजेत्।
माता पुत्रे जगत्सर्वं, पुत्रे च जगतीं पश्येत्॥

यस्य हृदये प्रेम पूर्णं, तस्य सीमा न विद्यते।
यशोदायाः प्रेम्णि कृष्णः, कृष्णे विश्वं प्रतिष्ठितम्॥

बालः स एव नन्दस्य, विश्वस्यापि जनार्दनः।
मातुः प्रेम्णा तु साक्षात्, ब्रह्माण्डं तत्र दृश्यते॥

- रानमोती / Ranmoti

Saturday, August 8, 2026

सोने के खजाने पर बैठा भिखारी

एक गाँव में एक भिखारी रहता था।

वह रोज़ एक पुराने घर के सामने बनी छोटी-सी खाली जगह पर बैठकर, अपने फटे-पुराने कपड़ों में, हाथ में कटोरा लेकर भीख माँगता था।

राहगीर उसे कुछ सिक्के दे देते, और उन्हीं थोड़े-थोड़े पैसों से वह अपना जीवन किसी तरह गुज़ारता था।

लेकिन उसे एक बात का बिल्कुल भी पता नहीं था कि जिस जगह पर वह वर्षों से बैठा था, ठीक उसी जमीन के नीचे सोने का एक विशाल खजाना दबा हुआ था।

वह हर दिन उस खजाने के ऊपर बैठकर भीख माँगता रहा, पर कभी उसे यह एहसास नहीं हुआ कि जिस दौलत की तलाश में वह दुनिया से माँग रहा है, वह तो उसके पैरों के नीचे ही दबी हुई है।

समय बीतता गया। एक दिन उस भिखारी की मृत्यु हो गई।

कुछ समय बाद लोगों ने उस पुराने घर को तोड़कर वहाँ खुदाई शुरू की। खुदाई के दौरान उन्हें जमीन के नीचे से सोने का एक विशाल खजाना मिला।

यह देखकर सब लोग आश्चर्यचकित रह गए और हँसते हुए बोले—

“कैसी विडंबना है! जिसने पूरी ज़िंदगी सोने के खजाने पर बैठकर फटे कपड़ों में भीख माँगी, उसे कभी यह पता ही नहीं चला कि असली दौलत तो उसके अपने पैरों के नीचे थी।”

सीख

हम में से बहुत-से लोग भी उस भिखारी की तरह होते हैं।
हम अपनी खुशियों, अपनी ताकत, अपनी प्रतिभा और अपने भीतर छिपे अनमोल खजाने को पहचान नहीं पाते। हम बाहर सुख और सफलता खोजते रहते हैं, जबकि हमारी सबसे बड़ी संपत्ति हमारे अपने भीतर ही होती है।

जो अपने भीतर छिपे खजाने को पहचान लेता है,
उसे दुनिया से माँगने की ज़रूरत नहीं पड़ती।

-लेखिका : रानमोती / RANMOTI


Wednesday, July 17, 2024

क्या सागर, क्या किनारा।



सागर की लहरे, एक छोटे कंकड को बडी तेजी से उछल उछल कर किनारे तक ले जा रही थी। उस कंकड को बडी खुशी हुई, ये सोचकर कि मै इन लहरो के किसी काम का तो हु नहीं, फिर भी ये लहरे कितना चाहती है मुझे। तभी तो मुझे अपने उपर उठाकर मेरे साथ आनंद से खेल रही है। कंकड ने और सोचा की 'मै कितना भाग्यशाली हूँ, जो मुझे ये तेज लहरे मीली, मेरा तो जीवन ही सफल हुँआ। उसे क्या पता था, जो लहरे उसके साथ आनंद से खेल रही है उनका तो यह स्वभाव है, की जो उनके काम का न हो, जो उन्हें भारी लगे, वो उसे दरकिनार कर देती है। फिर सागर में विलीन होकर, अपने जैसो के साथ ही असली आनंद ले पाती है। जब लहरे किनारे की और बढ़ती है, उन्हें भी लगता है वो खुद बढ़ रही है। लेकिन सच तो यह है की हवा उन्हे किनारे की और ढ़केल देती है।

वास्तविकता में देखा जाये तो ये एक फ़ोर्सफूल प्रोसेस है, मतलब हमारी भाषा मे जबरजस्ती की प्रक्रिया। पर देखने वालो ने, देखने मे ही गलती कर दी, लहरो को देखकर, वो हमेशा अपनी भावनावो के आवेश में, यही कहते और लिखते भी है, की लहरो को किनारा आकर्षित करता है, इसीलिए वो बार बार किनारे की ओर दौडती है। पर ये सही नहीं है। मेरी सोच तो ये है की, लहरो को किनारा कभी भी पसंद नहीं होता। इसीलिए उसे जो नापसंद है, वो भी वो बहा कर किनारेपर छोड देती है। उस भोलेभाले कंकड की भी यही दशा हुई उसे इतना उछलकर इसीलिए ले जा रहा था, ताकि वो दरकिनार हो सके ।

वो कंकड किनारेपर, लहरो के इंतजार मे रुका हुआ था। उसे लगा कि मुझे, लहरे वापस सागर ले जायेगी। और सागर में मेरे साथ आनंद से खेलेगी, पर जब भी लहरे आती, वो कंकड के थोडी दुरी से, सागर लौट जाती। कंकड ने बहुत इंतजार किया, चीखा, चिल्लाया पर किसी ने उसकी ना सुनी। ना खुदसे उठ पाता, ना उड पाता, बस वही पडा रहा। सुखा, गरम, ठंडा हर मौसम के साथ खुद को ढालता रहा।

अब कंकड ने, लहरो की उम्मीद छोड़ दी, उसने किनारे को अपना जीवन बना लिया। और जब गौर से किनारे को देखा, तो उसे पता चला की, उसके जैसे अनगीनत कंकड सागर कि लहरो ने, किनारेपर छोड दिए है। ये एक निरंतर प्रक्रिया है। उसने उस प्रक्रिया का स्वागत किया, मान लिया की वो भी एक इस प्रकृति का हिस्सा है। जैसा प्रकृति का नियम, वैसा गमन होना चाहिये। इसे मन मे ठानकर, किनारे को ठिकाना मान कर डटा रहा। उसने अब अपनी चारो ओर, बडी ध्यान से देखा की उन्ही अनगिनत कंकडो से, एक विशाल सागर का, किनारा बना है। किनारे की एक नई दुनिया बन गई है।और वो उसी नई दुनिया का एक हिस्सा था। एक श्याम, उस कंकड ने शांत मन से, अपने जैसे एक कंकड से पुछा, क्या तुम भी मेरे जैसा सोचते हो, की लहरे हमे किनारा कर देती है। तो उसने कहा हा बिलकूल ।

अब तुम ही देखो, जब लहरे किनारे की तरफ आती है, तब हवा के दबाव की जरूरत होती है। पर जब वापस जाती है, तो अपने आप, सहेज होकर जाती है। मतलब उसे सागर में ही रहना अच्छा लगता है। जीस प्रक्रिया को होने के लिए, किसी और माध्यम का दबाव होना जरूरी है, वो प्रेमपूर्वक होने का प्रतीक नही हो सकती। इस सत्य का स्विकार ही, अंतिम सत्त्य हो सकता है। दोनो कंकडोने हि नहीं, बल्की सारे किनारे ने ये स्वीकार कीया, और शांत हो गए। जब रात होती, तो किनारे के कंकड, चमकीले होने के कारन बडे सुंदर लगते . चाँद की रोशनी में चमकने की उनकी भी अपनी विशेषताये थी। सागर का पानी रात में डरावना लगता, पर किनारा सुंदर, शांत, शितल और चमकीला।

प्रकृति बडा खेल खेलती है। जब कुछ जीव समंदर से बाहर आते, वो किनारेपर ही अपने अंडे छूपाकर रखते, जब लोग पानी मे खेल खेल के थक जाते तो वो भी किनारे पर ही सुकून पाते। लहरो के लिए कंकडो का महत्व हो ना हो, पर प्रकृति की दृष्टी मे कंकडो से, किनारा बनता और वो भी उसके दुसरे जीवो के लिए उपयोगी हो जाता है। हमे लहरो या सागर की दुनिया मे रहकर अक्सर नही देखना चाहिए .उसके परे भी जीवन होता है। और वो भी उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना सागर का। इस विशाल सी दुनिया मे क्या सागर, क्या किनारा एक ही तो है। 

हमारा जीवन सागर के जिवन जैसा ही है। हमारे आसपास के लोग, समाज, रिश्तेदार, हमारे अपने करीबी, हमारे साथी, हमारी भावनाएं, हमारे सुख दुःख, हमारे लिये एक विशाल सागर बन जाते है। जब इसी सागर की लहरे, हमे बेमतलब समझकर दरकिनार करती है, तो हम उस किनारे के कंकड की तरह महसुस करने लगते है। हम अकेले नही है, इस सागर में, सबको दरकिनार होना ही है . और एक दिन किनारे वाली दुनिया मे जाकर चमकना भी है। तो क्या सागर, क्या किनारा ।

- रानमोती

Saturday, July 13, 2024

ईश्वर का संवाद, क्यों हम दुखी हैं |

एक दिन एक इंसान अकेले बैठकर रो रहा था।  और ईश्वर को कोस रहा था। 
उसने कहा, प्रभू मेरे पास बंगला, गाडी, बीबी बच्चे, दोस्त, रिश्तेदार,नौकर चाकर सब है। फिर भी मै दुखी हूँ।  ऐसा क्या कारण है, जो मुझे सबकुछ होते हुए भी दुखी रखता हैं। उसकी बाते सुनकर, ईश्वर  मन ही मन मुस्कुराये और उन्होंने ठान लिया की आज इसे ज्ञान का अमृत पिला ही देता हूँ। 

और तभी  इंन्सान ने कहा, प्रभु क्या आप मुझपर प्रसन्न हुए हो, जो मुस्कुरा रहे हो। तो प्रभु ने कहाँ  प्रसन्नता ही मेरा स्वभाव  है। और रही बात तुम्हारे दुःख  की, तो उसका कारण भी आज मै तुम्हे बता देता हूँ। .
तुम्हारे दुःख का कारण है तुम्हारी समझ और उसमे पनपी तुम्हारी ना समझ वाली जिद्द है। 
 मनुष्य ने कहा प्रभू, विस्तार से कहिये। तब उसपर ईश्वर कहते है, मनुष्य को समझ और 
ज्ञान न होने के कारण ओ उसी चीजो की जिद्द करता है, जिसकी उसको कोई समझ नही होती और 
वो अपने जीद के कारण उसी चीज को पा लेता है।  पर संभाल नही पाता ।

तुम्हे माली बनना नही आता, और बगीचे मांग लेते हो। 
घर बसाना नही आता, और शहर माँग लेते हो। 
 प्रेम करना नहीं आता, और आत्मा माँग लेते हो।
 राजा बनना नहीं आता, और सेवक माँग लेते हो। 
रिश्ता बनाना नही आता, और रिश्तेदार माँग लेते हो। 
दोस्ताना समझ नहीं आता, और दोस्त मांग लेते हो।
परवरीश करनी नही आती, और बच्चे माँग लेते हो। 
किसीका दुःख समझ नहीं पाते, और सुख माँग लेते हो।  
नारायण बन नहीं पाते, और धनलक्ष्मी माँग लेते हो। 
जीवन के अर्थ से अंजान हो तुम, और एक नया जीवन माँग लेते हो। 


राम के दुःख से भी लोगो को लगाव था, और रावण की सोने की लंका से घृणा। 
तुम ऊपर से  कितना भी जिद्दी बनकर चीजे बटोरते रहो, पर तुम्हारे अंदर जो बैठा है, उसे 
तलाश राम की। इसीलिए तुम दुखी हो। मैं  उन लोगो को भी वो सब दे देता हु, जो उसे संभाल नही पाते।  उनकी जीद की वजह से वो मुझसे वो सब पा तो लेते है, लेकिन प् कर भी संभल नहीं पाते।  


मै भी ईश्वर हूँ, ऐसे लोगो को मै ये सारी चीजे दे देता हू। और वो सब मुर्ख, इन्ही में उलझकर कर, 
दुखी होते है। पर जो असली चीज है, जो जीवन का सच्चा अमृत है, वो मै उनके लिये रखता हूँ, 
जो सारी चीजो के काबील हो कर भी, उन्ही चीजों को ऊपर उठाते है, जो कर्म मैंने उन्हे सोपें 
है और वो अपने उसी कर्मो से अमरता पा लेते है। वो खुद एक नया जीवन बन जाते है। 



#Ranmoti

Thursday, October 19, 2023

स्त्री हा गहनतेचा विषय आहे, अस्तित्वाचा विषय आहे, गंमतीचा किंवा सहज चर्चेचा नाही!

“तुच सृजन, तुच नवनिर्माण, तुच अंत, तुच अनंत”.

काहींना महिला हा विषय मुळात गंमतीशीर वाटत असेल तर कृपया मला माफ करा. कारण माझ्याकडून अशा अपेक्षा केल्या जातात की तुम्ही महीला या विषयावर काही गंमतीशीर लिहा कारण त्यांचा वाचक वर्ग अधिक आहे. महिला ह्या काय सोशल मिडीयाच्या कारखाण्यातील हास्यांचे चुटकुले बनविण्यासाठीचे रॉ-मटेरियल आहेत, की त्या फक्त गंमत जंमत म्हणून वाचायचा, हसायचा आणि डिवचून विसरुन जायचा विषय झाल्यात.

भारता सारख्या समृद्ध आध्यात्मिक आणि पुरातण संस्कृतीमध्ये महिला किंवा स्त्रीया हा उच्च कोटीचा पुजणीय विषय आहेत, विषयचं नाही तर उच्च कोटीच्या जीवनाचा अविभाज्य घटक आहेत. या देशात स्त्रियांची संवेदना, त्यांचा आदर त्यांची कल्पकता, कलात्मकता आणि त्याचं स्त्रीत्व म्हणजेच स्त्रीगुन यावर संशोधन, विचार मंथन होण्या इतपत वाव असतांना देखील, तो कोठून बरे गंमतीचा विषय झाला आणि या प्रगल्भ समाजाने त्याचा स्वीकारही कसा काय केला आणि खासकरून स्त्रीजातीने आपल्यावर होणा-या या हास्याच्या प्रयोगाला विरोध न करता त्याला तसेच चालू ठेवण्यास वाव का बरं दिला याचंच नवल मानावं लागेल.

(स्त्री फक्त भोग्य आहे.)

कधी पुरातण काळी स्वत:ला ज्ञानी पंडीत म्हणवणा-या महंतानी सांगीतले होते की मुळात स्त्रीकडे चेतना, आत्मा वगैरे काही नसते, ती फक्त पुरुषांकडेच असते, म्हणून जशी पुरुषाला आध्यात्माच्या मार्गावर गेल्यावर मुक्ती मीळते तशी स्त्रीला मीळत नाही. स्त्री फक्त भोग्य आहे. मग मला या महंताना विचारायचे आहे. ती आदिशक्ती महाकाली कोण होती जिने दानवांचा शिरच्छेद करुन रक्त प्राशन केले, ज्या दानवांनी तीला भोग्य समजले, तीला कमी लेखले, त्याचं काय झालं हे आपण मोठया अभिमानाने सांगत फिरतो.

नंतरच्या काळामध्ये स्त्रीवर जो अत्याचार झाला, तीला गुलामगिरीच्या सक्त बेडयामध्ये डांबवलं गेलं ते तर अविश्वसनीय आहे. या गुलामगीरीच्या खुना इतक्या खोलवर रुजल्या की जणू स्त्रीच्या जनुकावर त्याची कोडिंग होऊन त्या पिढ्यान पिढ्या सतत स्त्रीमध्ये उतरत गेल्या. ती मुक्त झाल्यानंतरही तीच्या मनावर स्त्री ही फक्त भोगाची वस्तू आहे असा प्रभाव झाला. तो प्रभाव आजही कायम दिसतो, फरक फक्त एवढाच की तेव्हा तीला हे सांगाव लागलं आणि आता मात्र ती तो विचार घेऊनच जन्माला येते. आपण नेहमी म्हणतो की इंग्रजांनी आपल्यावर राज्य केलं आणि आपल्याला त्यांची गुलामी बळजबरीने स्वीकारावी लागली. परंतू स्वातंत्र्यानंतरही आजच्या समाजात असं दिसुन येते की इंग्रज भौतीक दृष्टया येथून गेले असले तरी मानसीक दृष्टया ते आपल्यामध्ये आजही टिकून आहेत. आताची ही पाश्चात्य गुलामी भारतीयांनी स्वत: स्वीकारली आहे. त्यांना स्वत:ची संस्कृती व भाषा पाश्चात्य देशांपेक्षा हीन वाटते.

(तीने काहीशी गुलामी स्वत:च स्वीकारली आहे.)

तसंच काहीसं स्त्रीच झालं आहे. आजच्या समाजात स्त्री शिक्षीत व मुक्त असुनही तीने काहीशी गुलामी स्वत:च स्वीकारली आहे. उदाहरणासहीत स्पष्टीकरण दयायचं झालं तर जेव्हा ती स्वत:ला आरश्यात बघते, तेव्हा ती स्वत:ला स्वत:च्या दृष्टीने न बघता पुरुषांच्या दृष्टीने बघते, म्हणजे एखाद्या पुरुषाने तिच्याकडे बघीतल्यानंतर त्याला काय आवडेल त्या अनुषंगाने तिचा श्रृंगार अधिक झुकलेला असतो आणि तसच काहीसं वागणं देखील अंगीकृत केललं असतं. ब-याच वेळेला एखादा पोषाख तिच्या प्रकृतीसाठी व्यवस्थीत किंवा कम्फर्टेबल नसतो आणि तीच्या सहजतेसाठी देखील अडचणीचा असतो, तरीसुध्दा तो फॅशन च्या नावाखाली परीधान केला जातो.

भगिनींनो विसरू नका तुम्ही स्वत:मध्येच अद्भूत आहात, सर्वस्व आहात !

भगीनिंनो तुम्ही कारखाण्यातुन तयार झालेलं प्रोडक्ट आहात का? की शोभेच्या वस्तू आहात? ज्याला विकत घेणा-यांच्या किंवा बघणाऱ्यांच्या हीशोबाने पॅकेजींग किंवा नटण्याची गरज पडते. ते करा जे स्व:ताला सहज, सरळ आणि उपयोगी आहे. विसरू नका तुम्ही स्वत:मध्येच अद्भूत आहात. तुम्हीच आहात सर्व आणि ते सर्वस्व तुम्ही स्वतःमधूनच उत्पन्न करू शकता बाहेर शोधण्याची गरज तरी काय? स्वत:च्या विचारांच्या गहनतेमध्ये उतरुन स्वत:ला फुलवत चला, दुस-यांच्या आवडी नीवडीचा विचार फूलवण्यापेक्षा स्वत:च्या मनाचा विचार करा. इतरांना डोक्यावर घेण्याची गरज तरी काय ?

(स्त्री-पुरुषांची विवीधता या जगण्याला आणखी सुशोभीत बनवते)

स्वत:ला कमी किंवा जास्तही न लेखता, जे गूण तुमच्याकडे आहेत त्यांच्या तळाशी जाऊन स्वत:च्या व्यक्तीमत्वाचा विकास करा. काय गरज आहे तुम्हाला कोणाच्या बरोबरीत किंवा अधिपत्याखाली जगण्याची तुमचं जगणंच मुळात वेगळ आहे, ते तुम्ही तुमच्या पद्धतीने पुर्ण जगा. जगतांना विविधतेची गरज असते बागेमध्ये वेगवेगळी फुले वेगवेगळया रंगाची गंधांची अधिक शोभून दिसतात. तसंच हे जग एक बगीचा आहे, ज्यामध्ये स्त्री-पुरुषांची विवीधता या जगण्याला आणखी सुशोभीत बनवते, फुलवते. स्त्री फक्त स्त्रीच होऊ शकते तीला पुरुष बनण्याची गरजच नाही?

तुम्ही जगत आहात, मोकळा श्वास घेण्यासाठी, आजवर मोकळा श्वासही खुप घेतला, आता भरपूर मनसोक्त श्वास घेण्याची वेळ आली आहे. सोबतच एका नवीन विश्वात प्रवेश करण्याची कारण “तुच सृजन, तुच नवनिर्माण, तुच अंत, तुच अनंत”.

(दुस-याला भरवण्याआधी स्वत:ला भरवून सक्षम कर)

दुस-या जीवाला जन्म देण्याआधी तू हा विचार कर तू जशी जन्माला आणल्या गेली आहेस तो तुझा जन्म तुला मान्य आहे का ? नसेल तर मग आधी स्वत:ला नविन जन्म दे. दुस-याला भरवण्याआधी स्वत:ला भरवून सक्षम कर. तू कोमलतेच्या उपमेखाली अबला कमजोर बनू नकोस. कारण एक जिवंत स्त्रीच एका जीवंत जीवाला जन्म देऊ शकते. मृतक विचाराने जन्म दिलेले जीव मृतकच जन्माला येतील, मृतकच जगतील आणि मरण्याचा तर वीषयच नाही ते जन्मालाच मृतक आलेले असतिल.

या मनुष्य जातीला नष्ट करण्याची ताकद जेवढी नैसर्गिक आपत्तीमध्ये आहे, तेवढी ताकद स्त्रीमध्ये देखील आहे. कारण तीने जन्म दयायचा का नाही हे जर ठरवलं तर ही मनुष्यता लवकरचं संपुष्टात येईल. सद्यास्थितीत जापान देशात हेच होतय, तेथील स्त्रीया लग्न आणि मूल यापासुन स्व:ताला दुर ठेवत आहेत परिणामत: जापानची लोकसंख्या झपाट्याने कमी होत आहे. हे जगातील सर्व देशाबरोबर होण्याची शक्यता आहे.

यावरुन आपल्याला लक्षात आलंच असेल की स्त्री हा गहनतेचा वीषय आहे. अस्तित्वाचा विषय आहे. गंमतीचा किंवा सहज चर्चेचा विषय नाही. जय हिंद, जय भारत!


-रानमोती-
(राणी अमोल मोरे)
कवियत्री, लेखिका, कृषितज्ञ

Saturday, January 28, 2023

भारत की धरोहर को समर्पित "जड़ोंतक" हिंदी कवितासंग्रह प्रकाशित

भारत अध्यात्म और आधुनिकता एक सजग उदाहरण बन कर पूरी दुनिया में अपना परचम लहरा रहा है। इसी अध्यात्म और आधुनिकता का अनोखा संयोग अपने कविताओं के अंदाज में बांधकर मुंबई में स्थित वाशिम की मूलनिवासी साहित्यिका रानी अमोल मोरे (उलेमाले) जी का भारत की धरोहर को समर्पित "जड़ोंतक" हिंदी कवितासंग्रह गणतंत्र दिवस के अवसर पर प्रकाशित हुआ। विदर्भ पर्यटन पर आधारित "वऱ्हाड वारं" और साहित्य भूषण पुरस्कार प्राप्त "रानमोती" कवितासंग्रह के बाद रानी मोरे का यह हिंदी का पहला प्रयास है। फिर भी दिलचस्प बात यह है कि इस कविता संग्रह को सुप्रसिद्ध शास्त्रीय संगीत गायिका पद्मश्री पद्मजा फेनानी जोगलेकर जी ने अपनी प्रस्तावना से नवाजा है और 'नोशन प्रेस' प्रकाशन ने प्रकाशित किया है। इस कविता संग्रह में कुल नउ खंड और इक्यासी कविताओं का समावेश है। जिनमे आराधना, जीवनकल्प, धरोहर, आख्यान, अभिप्रेरणा, मलाल, नित्यरथ, कुदरत और बालरत्न खंड है। हर खंड की कविताये अपने विभाजन के अनुरूप विषयपर गहराई से भाष्य करती है।


अपनी कवितासंग्रह के बारे में कहते हुए रानी जी कहती है, ‘जड़ोंतक’ एक प्रयास है सच को सच के नजरीये से देखने का। जिसमें पढ़नेवाला भगवान श्रीकृष्ण से लेकर आधुनिक भारत की सत्तासंघर्ष तक हर वो विषय का आनंद ले सकता है और उसे ‘जड़ोंतक’ सोचने के लिए मजबूर हो सकता है। अगर पढ़नेवाले सच्चे मन से कविताओं में रूची रखते है तो 'जड़ोंतक' उनके लिये एक जंगल की सैर जैसा है, जहाँ शिकार भी है और शिकारी भी, जहाँ पाणी भी है और आग भी, जहाँ तितलियाँ भी है तो जहरीले नाग भी, कुछ काटे भी चुभेंगे तो कुछ खुबसूरत खिलते फूल मन को मोहित भी करेंगे। यहाँ साधना, ईश्वर, वैराग्य, यथार्थ, सत्य, जीवन, पुरुषार्थ हर वो गुण समाविष्ट करने का प्रयास किया गया है, जहाँ से पढ़नेवाला पूरा हो गुजरे और अपने जीवन को जटीलता भरे धागो से छुड़ाकर सरल करे। विभिन्न विषयों पर टिप्पणी करते हुए रानी मोरे का यह कवितासंग्रह युवाओं से लेकर वरिष्ठ नागरिकों तक सभी का मन मोह रह है। उक्त कवितासंग्रह सभी प्रमुख पुस्तक विक्रेताओं के पास उपलब्ध होने के साथ साथ सभी ऑनलाइन वेबसाइटों पर भी उपलब्ध है।



भारताच्या परंपरेला समर्पित ‘जडोंतक’ हिंदी कवितासंग्रह प्रकाशित

अध्यात्म आणि आधुनिकतेचे ज्वलंत उदाहरण म्हणून भारत संपूर्ण जगात आपला रुतबा अधिक बळकट करीत आहे. अध्यात्म आणि आधुनिकतेचा हाच अनोखा संगम आपल्या कवितांच्या शैलीत बांधून, मूळच्या वाशीम येथील, मुंबई मध्ये स्थायी असलेल्या राणी अमोल मोरे यांनी भारताच्या परंपरेला समर्पित केलेल्या ‘जडोंतक’ या हिंदी कवितासंग्रहाचे प्रजासत्ताक दिनाचे औचित्य साधून मुंबई येथे प्रकाशन करण्यात आले. विदर्भ पर्यटनावर आधारित 'वऱ्हाड वारं' आणि साहित्य भूषण पुरस्कार प्राप्त 'रानमोती’ या मराठी काव्यसंग्रहा नंतर राणी मोरे यांचा हा तसा हिंदीतील पहिलाच प्रयत्न. तरीही महत्वाची गोष्ट म्हणजे या कवितासंग्रहाला प्रसिद्ध शास्त्रीय संगीत गायिका पद्मश्री पद्मजा फेणाणी जोगळेकर यांनी प्रस्तावना दिलेली आहे आणि 'नोशन प्रेस' या प्रकाशनाने प्रकाशित केला आहे. या काव्यसंग्रहात एकूण नऊ विभाग आणि एक्यांशी कवितांचा समावेश आहे. ज्यामध्ये आराधना, जीवनकल्प, धरोहर, आख्यान, प्रेरणा, मलाल, नित्यरथ, कुदरत आणि बालरत्न विभाग आहेत. प्रत्येक विभागातील कविता त्या-त्या विभागणीनुसार विषयावर खोलवर भाष्य करतात.


आपल्या कवितासंग्रहाबद्दल बोलताना राणी मोरे म्हणतात, ‘जडोंतक’ हा सत्याकडे सत्याच्या दृष्टिकोनातून पाहण्याचा एक प्रयत्न आहे. ज्यामध्ये वाचकाला भगवान श्री कृष्णापासून आधुनिक भारताच्या सत्तासंघर्षा पर्यंतच्या प्रत्येक विषयाचा आस्वाद घेता येईल आणि त्याच्या 'मुळांपर्यंत' जाऊन विचार करायला भाग पडेल. वाचकांना जर खरोखरच कवितांमध्ये रस असेल, तर ‘जडोंतक’ त्यांच्यासाठी जंगलात मनसोक्त फिरण्यासारखे आहे, जिथे शिकार आहे तर शिकारी पण, जिथे पाणी आहे तर आग पण, जिथे फुलपाखरे आहेत तर विषारी साप पण, कधी सुंदर बहरलेली फुले मन मोहून टाकतील तर कधी काटे हि रुततील. इथे साधना, ईश्वर, वैराग्य, वास्तव, सत्य, जीवन, पुरुषार्थ या सर्व गुणांचा अंतर्भाव करण्याचा प्रयत्न दिसेल, ज्यातून वाचकाला जीवनाच्या क्लिष्ट धाग्यांपासून सुटका करून आपले जीवन साधे करण्यात मदत होईल. विविध विषयांवर भाष्य करणारा राणी मोरे यांचा हा कवितासंग्रह तरुणांपासून ज्येष्ठ नागरिकांपर्यंत सर्वांनाच भुरळ घालणारा आहे. सदर कविता संग्रह सर्व प्रमुख पुस्तक विक्रेत्यांकडे तसेच सर्व ऑनलाइन वेबसाइटवर उपलब्ध आहे.





Friday, August 19, 2022

एक दिन की समस्या


दूर दराज़ जंगल के पार
बस्ती थी मेरी और परिवार
सुन्दर नदी पेड़ों की मुस्कान
बाढ़ का साया हरसाल तूफान
एक टुटाफूटा घर मानो छाले पड़े
जीवन पनपता उसमे जैसे वृक्ष खड़े
हर दिन नया सवेरा जीने की आस थी
एक डरावने दिन और रात की बस बात थी

माँ की सांसो को हर पल हृदय नाप रहा था
नौ महीनो से सृष्टि की चाहत में तरस रहा था
शायद वह आखरी दिन था माँ की कोख में रहने का
उसकी भी चाह थी मै बाहर आऊँ आनंद लू जीवन का
माँ तड़प रही थी दर्द से मदद मांगती किसी मर्द से
शायद वह मेरा बाप था जो व्याकुल था मेरी उम्मीद से
उस टूटीफूटी झोपडी में बारिश गंगा रूप बरस रही थी
बाढ़ और तूफान से बस वही एक सबका सहारा थी

बड़ी कठनाई संग माँ की कोख छोड़ पैदा हुआ
पहिली बार किसी अनछुये स्पर्श का एहसास हुआ
आँखे खोलू की ना खोलू समझ में ना आया
दुनिया में दिन पहला था या आखरी जान ना पाया
एक माई आकर बोलने लगी यह बचेगा नहीं
यहाँ का माहौल इसे इसकदर जचेगा नहीं
चलो ले चलो इसे अस्पताल नदी पार कही
जहा मिले इसे सुविधा डाक्टर और इलाज सही

आँखे खोलने ही वाला था पर मै घबरा गया
सोचा खोल के भी क्या करू जब वक्त निकल गया
एक दिन की दुनिया की मोहब्बत में पड़ जाऊँगा
जो पाया नहीं देखा नहीं उसे भी पल में खो जाऊँगा
इस कश्मकश में जीवन की एक घड़ी बीत गई
चाह थी रोशनाई की अंधियारे संग मिटती गई
अचानक दो चार बस्तीवाले जमा होकर पास आये
एक झोली में डाल मुझे अपने साथ ले गये

शायद उन्हें नदी पार कर मुझे ले जाना था
बाढ़ तो मानो धरती पर निरंतर झरना था
लड़खड़ाते पाँव ले गये आखिर किनारे तक
दूसरी घड़ी भी बीत गई इंतजार में तब तक
मौत मंडराती रही जिंदगी घुटने टेक रही थी
आरोग्यसेवा ठप्प थी दरबदर सन्नाटे की गंध थी
सब छाती पिट हताश हो बस्ती को कोस रहे थे
कहानी ये उन सबकी हरसाल बस सोच रहे थे

आशा निराशा में बदल गई जब तीसरी घड़ी आई
हर किसी की उम्मीदों पर मातम की परछाई
ठण्ड से रोम रोम मेरा कांप सिकुड़ रहा था
भूख के मारे पेट ज्वाला बन तड़प रहा था
रोने का मन किया सोचा इन्हे बोल दूँ
अपनी मासूम सी भूख अब खोल दूँ
फिर मन ही मन मुस्कुराया और
खुदसे ही बोला सुन ज़रा रुक
एक दिन की तो समस्या है
बस एक दिन की समस्या

-रानमोती / RANMOTI
{महाराष्ट्र के पालघर जिले की बालमृत्यु घटना से प्रेरित}

Saturday, July 23, 2022

बुद्धि को ग्रहण या आच्छादन


हिंदी भाषा में ग्रहण शब्द का अर्थ होता है धारण करना, स्वीकार करना या फिर किसी चीज को खा जाना। अगर यह अर्थ सही है, तो सूर्य ग्रहण या चंद्र ग्रहण का मतलब सूर्य या चंद्र को खा जाना या धारण करना इस तरह निकाला जा सकता है। सदियों पहले जब मनुष्य को सूर्य और चंद्र ग्रहण के वैज्ञानिक कारन पता नहीं थे, तबतक यह कहना ठीक था की सूर्य या चंद्र को सृष्टि की कोई और चीज निगल लेती है फिर खा जाती है। लेकिन अब जब इंसान को वैज्ञानिक सफलताओ के चलते, यह पूरी तरह पता है की सूर्य और चंद्र ग्रहण एक प्राकृतिक घटना है, और यह घटना पृथ्वी और चंद्र के एक दूसरे के बिच में आ जाने से उत्पन्न होती है। संक्षिप्त में हम इसे आच्छादन कह सकते है। ग्रहण शब्द का यहाँ पर कोई भी अर्थ या मतलब न होकर आच्छादन यह अर्थपूर्ण शब्द कहा जा सकता है।

पुराने कालखंड के अनुसार ग्रहण यह शब्द कुछ बनावटी कहानियों के चलते 'नकारात्मकता' से उभरा हुआ प्रतीत होता है । लेकिन वास्तविकता में ग्रहण यह शब्द एक स्वीकृति दर्शाकर 'सकारात्मकता' प्रस्तुत करता है। हम आज भी बोलते समय किसी नकारात्मक चीज को दर्शाने के लिए 'ग्रहण लग गया' इस उपमा का इस्तेमाल कर लेते है। जबकि इसका सही अर्थ या मतलब 'किसीको स्वीकृति लगना' होता है। इसी भाषा या उपमा को समझकर बोले तो हम यह कह सकते है की मनुष्य की 'बुद्धि को ग्रहण' लग गया, की वे आजतक बिना मतलब ग्रहण शब्द का इस्तेमाल किये जा रहा है। मेरी समझ से कहूँ तो 'मनुष्य बुद्धिपर आच्छादन है' जैसे की 'चंद्र आच्छादन', 'सूर्य आच्छादन' होते है।

- रानमोती / Ranmoti

Monday, July 4, 2022

प्रकाश : विज्ञान और आध्यात्म


हम प्रकाश को देखते है, महसूस करते है, लेकिन आज हम उसे समझने की कोशिश करेंगे, जो हमारे इर्दगिर्द मौजूद है और जो हमारे भीतर भी लुप्त अवस्था में स्थापित है। खास कहे तो सूर्य के प्रकाश और इंसान के भीतर मौजूद आत्मप्रकाश को समझते है। विज्ञान की भाषा में अगर प्रकाश को समझा जाये तो, उसके क्या गुण है, उसे पहले जानने का प्रयास करते है। 
  1. प्रकाश दिखने में तो एक सफ़ेद किरण जैसी है। लेकिन उसे जब किसी पारदर्शक पिरामिड से पार किया जाये तो, उसके अंदर छिपे सात रंग उजागर होकर हमें रंगीन किरण दिखने लगती है।  
  2. प्रकाश की किरण हमेशा सीधी रेशा में भ्रमण करती है।  
  3. प्रकाश की गति ब्रम्हांड की सबसे तेज गति है।  
  4. प्रकाश एक तरंग है जो बिना किसी माध्यम के भी स्पेस यात्रा कर सकती है।   
ये सारे प्रकाश के गुण हमने वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझे । अगर हम आध्यात्म की भाषा में प्रकाश या प्रकाशमई इंसान इनकी व्याख्या और गुणों का अवलोकन करे तो हमें विज्ञान और आध्यात्म एक दूसरे की कसौटीपर उतारकर देखना होगा. 
  1. अगर कोई इंसान प्रकाशमई है या बुद्धत्व को प्राप्त है, तो वो सामान्य मनुष्य को तो देखने में वो एक साधारण सा एक जिव लगेगा। लेकिन महापुरुष को समझने के लिए हमें  पारदर्शक पिरामिड के दृष्टिकोण की आवश्यकता होगी तब जाकर हम उसके महानतम या प्रकाशमय गुणों को समझ सकेंगे।  
  2. बुद्धत्व को प्राप्त इंसान हमेशा सत्य के मार्ग की सीधी राह पर चलेगा प्रकाश की तरंग जैसा।  
  3. सिद्ध आत्मा के दिये भौतिक जीवन या शरीर में कोई भेद न देखकर वह सूक्ष्मतम शरीर की भाती सबको एक समान तरंग की तरह देखेगा और मानेगा। 
  4. जिसने अपने बुद्धि की सारे दरवाजे खोले है, वो सबसे गतिमान होगा, क्योंकि उसे रोकने या सोचने की कोई वजह ना होगी, वो हर चीज से वाकिब हो चूका होगा।  
  5. जहा यात्रा करने का कोई माध्यम (हवा, पानी या धातु) उपलब्ध नहीं होगा तब भी वो अपने आप को सबसे गतिमान यात्री पायेगा। विज्ञानं कीभाषा में हम उसे होलोग्राम  कहते है। 
इन सारी बातों का सारांश एक ही निकलता है, जहा प्रकाश है वहा उजियाला है। चाहे वो विज्ञानं हो या बुद्धत्व की ओर ले जानेवाला आध्यात्म हो। इन सभी जगहोंपर प्रकाश के गुण समान है। मतलब भौतिक विज्ञानं हर जगह परखा और समझा जा सकता है। इसीलिए विज्ञानं की सतह पर आध्यात्म को समझे तो कोई भी बात हवा में ना लगकर वास्तव दर्शन दिलाती है।  


- रानमोती / Ranmoti


Wednesday, November 24, 2021

रानमोती काव्यसंग्रह को “साहित्य भूषण” पुरस्कार


अखिल भारतीय मराठी साहित्य आंदोलन के प्रमुख केंद्र मराठी साहित्य मंडल की ओरसे इस वर्ष का साहित्य क्षेत्र का महत्वपूर्ण साहित्य भूषण पुरस्कार महाराष्ट्र के वाशिम जिल्हे की मिट्टी से जुड़ी मुंबई की युवा साहित्यकार रानी अमोल मोरे - उलेमाले के रानमोती काव्यसंग्रह को सातारा में हालही में सम्पन्न हुए तृतीय डा. बाबासाहेब आंबेडकर साहित्य सम्मेलन में प्रदान किया गया । 

इस साहित्य सम्मेलन का उध्दाटन वरिष्ठ विचारवंत राजरत्न आंबेडकर ने किया तथा सम्मेलन अध्यक्ष के रुप में सिक्कीम के पूर्व राज्यपाल तथा महान विचारक डा. श्रीनिवास पाटिल व स्वागताध्यक्ष वरिष्ठ विचारक एड. गौतम सरतापे उपस्थित थे तथा मुख्य अतिथि के रुप में पूर्व न्यायाधीश व वरिष्ठ विचारक रावसाहेब झोडगे, वरिष्ठ साहित्यिकार डा. जयप्रकाश घुमटकर, कवयित्री ललिता गवांदे, कवयित्री नीलीमा जोशी, लेखक विनायकराव जाधव उपस्थित थे । 

रानमोती वैसे तो वऱ्हाड वार विदर्भ पर्यटन पर आधारित काव्यसंग्रह के बाद आया रानी मोरे का दूसरा ही काव्य संग्रह है फिरभी जीवनावश्यक विषय पर बेहद गंभीर और निरागस रुप से भाष्य करनेवाला, अनावश्यक रुढ़ी प्रथाओं पर आघात करनेवाला, आ‍धुनिक काल के मराठी काव्य क्षेत्र में विभाग निहाय प्रस्तुति करनेवाला, प्रिंट तथा डिजिटल प्लेटफार्म पर उपलब्ध पहला ही काव्य संग्रह होने से साहित्य भूषण पुरस्कार के लिए चुने जाने का प्रतिपादन वरिष्ठ साहित्यिकार तथा चयन समिति अध्यक्ष डा. जयप्रकाश घुमटकर ने स्पष्ट किया । 

पुरस्कार स्वीकारते समय रानी अमोल मोरे - उलेमाले ने मराठी साहित्य मंडल का आभार व्यक्त करते हुए दैनदिन मानवी जीवन के लिए उपयोगी और प्रगति के लिए जिम्मेदार साबित होनेवाली जीवन उपयोगी बातों पर लेख को मराठी साहित्य में भारी तादाद होने की बात स्पष्ट की । साथही महाराष्ट्र के साहित्य क्षेत्र को देशस्तर पर पुनर्जीवित करने के लिए प्रयास करने की बात भी कही 


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