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Thursday, October 8, 2026

वह सच्चा प्रशंसक था… दोनों हाथों में घड़ियाँ, गले में पेन का साज और मन में एक अधूरी आस..

वह सच्चा प्रशंसक था…

दोनों हाथों में घड़ियाँ, गले में पेन का साज और मन में एक अधूरी आस..

आज सुबह नाना पाटेकर जी के निधन की खबर सुनी तो कुछ देर तक मन जैसे ठहर-सा गया।

कुछ कलाकार ऐसे होते हैं, जिन्हें हम केवल पर्दे पर देखते हैं। उनके अभिनय की तारीफ करते हैं, उनकी फिल्में देखते हैं और फिर अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में लौट जाते हैं।

लेकिन कुछ कलाकार ऐसे होते हैं, जो धीरे-धीरे हमारी स्मृतियों का हिस्सा बन जाते हैं। उनकी आवाज़, उनका चेहरा, उनका कोई संवाद या उनका निभाया हुआ कोई किरदार—कहीं न कहीं हमारे भीतर रह जाता है।

नाना पाटेकर उन्हीं कलाकारों में से एक थे।

उनके अभिनय में बनावट नहीं थी। संवाद बोलते हुए ऐसा लगता था जैसे शब्द लिखे हुए नहीं, बल्कि भीतर से निकल रहे हों। उनकी आवाज़ में एक ऐसी सच्चाई थी, जो सीधे दिल तक पहुँचती थी।

और आज उनके जाने की खबर ने मुझे लगभग दस-पंद्रह दिन पहले की एक छोटी-सी मुलाकात फिर से याद दिला दी।

एक ऐसी मुलाकात, जिसे उस समय शायद हमने सामान्य-सी घटना समझा था।

लेकिन आज लगता है, वह मुलाकात अपने भीतर एक पूरी कहानी समेटे हुए थी।


हम मध्य प्रदेश के महेश्वर, जिला खरगोन गए थे।

नर्मदा के किनारे बसा महेश्वर—इतिहास, आस्था और शांत बहती नदी के बीच खड़ा एक सुंदर शहर। देवी अहिल्याबाई होलकर की स्मृतियों से जुड़ी इस नगरी में हम देवी अहिल्याबाई होलकर के महल के पास स्थित बांके बिहारी भोजनालय में भोजन करने गए थे।

हम खाना खाने बैठे ही थे कि एक बुज़ुर्ग व्यक्ति हमारे पास आकर खड़े हो गए।

उम्र लगभग अस्सी-बयासी वर्ष रही होगी।

शरीर बहुत दुबला-पतला था। चेहरे पर उम्र की गहरी रेखाएँ थीं। लेकिन आँखों में एक अजीब-सी चमक थी—जैसे जिंदगी ने उन्हें बहुत कुछ दिखाया हो, मगर उनकी जिज्ञासा अभी भी खत्म न हुई हो।

और सबसे पहली चीज़ जिसने मेरा ध्यान खींचा, वह थीं उनकी घड़ियाँ।

उनके दोनों हाथों में कई घड़ियाँ थीं।

कुछ पुरानी, कुछ नई।

मैं खुद को रोक नहीं पाई और पूछ बैठी—

“आपने इतनी सारी घड़ियाँ क्यों पहन रखी हैं?”

उन्होंने मेरी ओर देखा और बहुत सहजता से कहा—

“जीवन एक संघर्ष है… और ये घड़ियाँ समय का प्रतीक हैं। पुराना समय और नया समय… दोनों को साथ लेकर चल रहा हूँ।”

मैं कुछ क्षण चुप रह गई।

कितना साधारण-सा उत्तर था।

लेकिन उस उम्र के एक व्यक्ति के मुँह से निकला वही साधारण वाक्य अचानक बहुत गहरा लगने लगा।

पुराना समय और नया समय… दोनों को साथ लेकर चलना।

शायद यही तो जीवन है।


लेकिन उनकी कहानी में अभी और भी बहुत कुछ था।

उनके पास दस-पंद्रह अलग-अलग पेन भी थे।

मेरे बेटे ने उन्हें देखा तो उससे भी रहा नहीं गया। उसने पूछ लिया—

“दादाजी, आपके पास इतने सारे पेन क्यों हैं?”

बुज़ुर्ग ने मुस्कुराकर उसकी ओर देखा और कहा—

“अगर कोई स्कूल का बच्चा या कोई भी बच्चा मुझसे कहता है—‘दादाजी, कुछ दे दो’… तो मैं इनमें से एक पेन निकालकर उसे दे देता हूँ।”

उनका जवाब सुनकर हम कुछ क्षण उन्हें देखते ही रह गए।

किसी बच्चे के हाथ में चॉकलेट रख देना आसान है।

कोई टॉफी दे देना भी आसान है।

लेकिन किसी बच्चे के हाथ में पेन देना और उसके पीछे एक सोच रखना—यह बात अलग थी।

उनका मानना था कि अगर कोई बच्चा उनसे कुछ माँगता है, तो उसे ऐसी चीज़ दी जाए जो उसे पढ़ाई की ओर ले जाए।

एक पेन—शायद छोटी-सी चीज़ थी, लेकिन उनके लिए वह शिक्षा का संदेश था।

वे अपनी तरह से बच्चों को पढ़ाई के लिए प्रेरित करना चाहते थे। उन्हें यह एहसास दिलाना चाहते थे कि हाथ में पकड़ा हुआ पेन केवल लिखने की वस्तु नहीं, बल्कि आगे बढ़ने का एक साधन भी हो सकता है।

उस उम्र में भी उनके भीतर बच्चों की पढ़ाई को लेकर इतनी चिंता थी।

मुझे लगा, कुछ लोग उम्र के साथ बूढ़े होते हैं…

और कुछ लोग उम्र के साथ और गहरे होते जाते हैं।

भोलेजी शायद उन्हीं लोगों में से थे।


बातचीत आगे बढ़ी तो पता चला कि उनका नाम भोले था।

वे मूल रूप से मध्य प्रदेश के रहने वाले नहीं थे। महाराष्ट्र के एक ब्राह्मण परिवार से उनका संबंध था। वे कभी मुंबई में भी रहे थे, लेकिन वहाँ टिक नहीं सके और बाद में मध्य प्रदेश लौट आए।

वे मुझसे हिंदी में बातें कर रहे थे।

बातों-बातों में उन्होंने अचानक कहा—

“तुम बिल्कुल मेरी भतीजी जैसी दिखती हो।”

उनकी आँखों में उस समय जो अपनापन था, वह औपचारिक नहीं था।

शायद मुझे देखकर उन्हें सचमुच अपनी भतीजी याद आ गई थी।

मेरे पति भी मेरे साथ थे। भोलेजी उनसे भी बड़ी आत्मीयता से बातें करने लगे।

फिर अचानक बातचीत के बीच उन्होंने एक बात कही—

“मुझे मुंबई जाना है।”

मेरे पति ने पूछा—

“मुंबई क्यों जाना है?”

उन्होंने बिना किसी झिझक के कहा—

“मुझे नाना पाटेकर से मिलना है।”

बस।

इतना-सा वाक्य।

लेकिन उस एक वाक्य ने जैसे पूरी बातचीत का रुख बदल दिया।


मैंने उनकी ओर देखा।

अस्सी-बयासी साल का एक बुज़ुर्ग।

दुबला-पतला शरीर।

दोनों हाथों में घड़ियाँ।

गले में पेन।

जिंदगी की न जाने कितनी मुश्किलों और उतार-चढ़ावों से गुजर चुका इंसान।

लेकिन उसके भीतर अभी भी एक इच्छा उतनी ही जीवित थी, जितनी शायद किसी युवा प्रशंसक के मन में होती है।

नाना पाटेकर से एक बार मिलना।

मेरे पति ने उनसे पूछा—

“नाना पाटेकर से ही क्यों मिलना है?”

यह सवाल सुनते ही उनके चेहरे पर एक अलग चमक आ गई।

उन्होंने कहा—

“नाना पाटेकर जैसा कलाकार मैंने कभी नहीं देखा। मैं उनका बहुत बड़ा प्रशंसक हूँ। उनका अभिनय… उनकी आवाज़… उनका संवाद बोलने का तरीका… सब कुछ दिल को छू जाता है। वो जो बोलते हैं, वो सिर्फ बोलते नहीं—महसूस करवाते हैं।”

उस समय उनके चेहरे को देखना अपने आप में एक अनुभव था।

वह किसी प्रसिद्ध अभिनेता का नाम लेते हुए केवल उत्साहित नहीं थे।

वह जैसे अपने किसी प्रिय व्यक्ति के बारे में बात कर रहे थे।

और तभी मेरे मन में एक सवाल आया—

आखिर सच्चा प्रशंसक होता कौन है?

क्या वह, जो किसी कलाकार की फिल्म देखता है?

क्या वह, जो उसकी तस्वीर लगाता है?

क्या वह, जो सोशल मीडिया पर उसके निधन के बाद श्रद्धांजलि लिखता है?

या वह, जिसके जीवन के अंतिम पड़ाव में भी उस कलाकार से मिलने की इच्छा बची रहती है?

शायद…

वही सच्चा प्रशंसक होता है।


मेरे पति ने भोलेजी से कहा—

“आप जब भी मुंबई आएँ, हमें जरूर बताइएगा। हम अपनी तरफ से पूरी कोशिश करेंगे कि आपकी नाना पाटेकर से मुलाकात हो सके।”

हम जानते थे कि हम कोई निश्चित वादा नहीं कर सकते।

किसी कलाकार से मुलाकात हो जाएगी, इसकी गारंटी देना हमारे हाथ में नहीं था।

लेकिन उनकी इच्छा को हल्के में लेना भी हमें ठीक नहीं लगा।

इसलिए हमने बस इतना कहा कि—

अगर भोलेजी मुंबई आएँगे, तो हम अपनी तरफ से पूरी कोशिश जरूर करेंगे।

उस समय हमें क्या पता था कि कुछ ही दिनों बाद हालात इतने बदल जाएंगे।


आज नाना पाटेकर हमारे बीच नहीं हैं।

और आज जब उनके जाने का दुख पूरे देश में है, तब महेश्वर के उस बांके बिहारी भोजनालय में हुई वह मुलाकात बार-बार आँखों के सामने आ रही है।

मन में एक सवाल उठता है—

भोलेजी को यह खबर मिली होगी तो उनके मन पर क्या गुज़री होगी?

जिस व्यक्ति से मिलने की इच्छा उन्होंने इतने विश्वास से अपने मन में सँजो रखी थी…

जिसके लिए उन्होंने कहा था—

“मुझे नाना पाटेकर से मिलना है…”

वह इच्छा शायद अब अधूरी ही रह गई।

शायद वह मुलाकात कभी नहीं हो पाएगी।

और यही सोचकर मन में एक अजीब-सी उदासी उतर आती है।

लेकिन उस मुलाकात ने मुझे नाना पाटेकर की लोकप्रियता का एक ऐसा रूप दिखाया, जो शायद किसी पुरस्कार, सम्मान या बॉक्स ऑफिस के आँकड़े से कहीं बड़ा है।

किसी कलाकार का किसी अनजान इंसान के मन में अपने लिए मिलने की ऐसी तड़प पैदा कर देना—यही तो कला की असली ताकत है।

नाना पाटेकर केवल किरदार निभाते नहीं थे।

वे उन्हें जीते थे।

उनकी आवाज़ में शब्द होते थे, लेकिन उन शब्दों के पीछे भावनाएँ होती थीं।

उनके अभिनय में दिखावा नहीं था।

एक कच्चापन था।

एक सच्चाई थी।

और शायद इसी कारण वे पर्दे से निकलकर लोगों के जीवन का हिस्सा बन गए।


आज एक बड़ा कलाकार चला गया।

एक बड़ी आवाज़ शांत हो गई।

एक असाधारण अभिनय यात्रा थम गई।

लेकिन कलाकार की जिंदगी केवल उसके जाने तक नहीं होती।

वह उसके बाद भी चलती रहती है—

उसके किरदारों में,

उसके संवादों में,

उसकी आवाज़ में,

और उन लोगों की यादों में, जिनके दिल में उसने कभी जगह बनाई थी।

मेरे लिए नाना पाटेकर की आज की सबसे बड़ी याद कोई पुरस्कार नहीं है।

कोई प्रसिद्ध संवाद भी नहीं।

मेरी आँखों के सामने तो बस महेश्वर के उस बांके बिहारी भोजनालय में मिले भोलेजी हैं।

एक दुबला-पतला, वृद्ध व्यक्ति…

दोनों हाथों में तरह-तरह की घड़ियाँ…

गले में दस-पंद्रह पेन…

किसी बच्चे के “दादाजी, कुछ दे दो” कहने पर अपनी पेन में से एक पेन निकालकर उसके हाथ में रख देने वाला…

चॉकलेट के बजाय पेन देकर बच्चों को पढ़ाई और शिक्षा की ओर प्रेरित करने वाला…

और अपने मन में एक ऐसी इच्छा सँजोए हुए, जो शायद अब कभी पूरी नहीं होगी—

“मुझे नाना पाटेकर से मिलना है।”

आज उस अनजान प्रशंसक की याद आ रही है।

और उसके साथ याद आ रहे हैं नाना पाटेकर।

शायद यही किसी कलाकार की सबसे बड़ी उपलब्धि है—

कि उसके जाने के बाद भी कोई दूर किसी छोटे-से शहर में बैठा व्यक्ति उसे याद करे और कहे—

“मैं उनसे एक बार मिलना चाहता था…”

नाना पाटेकर को भावपूर्ण श्रद्धांजलि। 🙏

नाना, आप चले गए…
लेकिन आपकी कला, आपकी आवाज़ और आपके अभिनय की वह सच्चाई
असंख्य दिलों में हमेशा जीवित रहेगी।

- रानमोती / Ranmoti

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